📿 श्लोक संग्रह

भवाप्ययौ हि भूतानाम्

गीता 11.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
भवाप्ययौ
उत्पत्ति और विनाश
भूतानाम्
प्राणियों की
कमलपत्राक्ष
कमल के पत्तों जैसे नेत्र वाले
माहात्म्यम् अव्ययम्
अविनाशी महिमा

अर्जुन कहते हैं — हे कमलनयन, मैंने आपसे विस्तार से सुना कि सब प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश कैसे होते हैं, और आपकी अविनाशी महिमा क्या है। यह सुनकर मन और भी जिज्ञासु हो गया।

अर्जुन यहाँ कृष्ण को 'कमलपत्राक्ष' कहते हैं — जिसके नेत्र कमल के पत्तों जैसे विशाल और कोमल हों। यह संबोधन भक्त के प्रेम को दर्शाता है।

दसवें अध्याय में कृष्ण ने अपनी विभूतियों और सृष्टि के विस्तार का वर्णन किया था। अर्जुन उसी का उल्लेख यहाँ कर रहे हैं।

यह श्लोक अर्जुन की विश्वरूप देखने की प्रार्थना की भूमिका है — वे पहले बताते हैं कि वे पहले से कितना जान चुके हैं।

अध्याय 11 · 2 / 55
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