संजय विश्वरूप का वर्णन करते हैं — उस रूप में अनेक मुख थे, अनेक नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे। दिव्य आभूषणों से सजा वह रूप था और अनेक दिव्य अस्त्र उठाए हुए थे। यह वर्णन पढ़कर ही मन स्तब्ध हो जाता है।
यह 11.10 और 11.11 मिलकर एक ही विस्तृत वर्णन हैं। संजय के पास शब्द कम पड़ रहे हैं — इसीलिए वे 'अनेक' शब्द बार-बार दोहराते हैं।