गणेश पुराण के अनुसार ब्रह्मदेव ने एक बार ऋषि कपिल को एक अमूल्य रत्न दिया था। उस रत्न का नाम था चिंतामणि — जो इच्छाओं का जागरण करने वाला माना जाता था। ऋषि कपिल उस रत्न की रक्षा बड़ी श्रद्धा से करते थे।
गणेश पुराण में आगे बताया गया है कि गण नाम के एक असुर की नज़र उस रत्न पर पड़ी। उस असुर ने ऋषि के आश्रम पर आक्रमण कर चिंतामणि रत्न छीन लिया। ऋषि कपिल बहुत व्यथित हुए और उन्होंने गणेश की आराधना की।
गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश ने उस असुर से युद्ध किया और उसे परास्त किया। रत्न वापस ऋषि कपिल को मिल गया। ऋषि कपिल ने कृतज्ञता में वह चिंतामणि रत्न स्वयं गणेश के गले में धारण करा दिया। तभी से इस स्थान के गणेश चिंतामणि कहलाए।
परंपरा में कहा गया है कि यह स्थान मुला और मुठा नदियों के संगम पर बसा है। भक्त यहाँ दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं और संगम तट पर भी पूजन करते हैं।
गणेश पुराण के अनुसार ऋषि कपिल ने कृतज्ञता में चिंतामणि रत्न स्वयं गणेश के गले में पहनाया — तभी से यहाँ के गणेश चिंतामणि कहलाए।
थेऊर का चिंतामणि मंदिर पुणे से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर मुला और मुठा नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टविनायक यात्रा का पाँचवाँ पड़ाव माना जाता रहा है। नदियों के संगम का वातावरण इस स्थान को शांत और हरा-भरा बनाता है।
परंपरा के अनुसार भक्त यहाँ माघ चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर विशेष रूप से आते हैं। मंदिर के आसपास बड़े पीपल और बरगद के पेड़ हैं। संगम तट पर बैठकर भक्त जल-पूजन भी करते हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।
- प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है। गणेश चतुर्थी पर विशेष महोत्सव होता है।
- माघ चतुर्थी और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर भक्तों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।
- मंदिर के पास नदी तट पर शांत वातावरण में बैठना भक्तों को प्रिय लगता है।