गणेश पुराण के अनुसार देवी पार्वती — जिन्हें गिरिजा भी कहते हैं, अर्थात पर्वतराज की पुत्री — ने एक बार इस पर्वत की कंदरा में बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी आराधना में गणेश की विशेष भक्ति थी।
गणेश पुराण में बताया गया है कि देवी की भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश ने उनकी कोख से पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसी गुफ़ा में देवी गिरिजा के पुत्र के रूप में गणेश का प्रकाट्य हुआ। इसीलिए यहाँ के गणेश गिरिजात्मज कहलाते हैं — अर्थात गिरिजा के पुत्र।
परंपरा में कहा गया है कि लेण्याद्री पर्वत पर तीन सौ से अधिक सीढ़ियाँ चढ़कर यह गुफ़ा मंदिर आता है। आसपास बौद्ध काल की कंदराएँ भी हैं, जो इस पर्वत की प्राचीनता की साक्षी हैं।
ऐसी मान्यता रही है कि यह अष्टविनायक में एकमात्र स्थान है जहाँ गणेश की स्थापना किसी निर्मित मंदिर में नहीं, बल्कि पर्वत की प्राकृतिक और कृत्रिम गुफ़ा में हुई। भक्त यहाँ पर्वत की शांत ऊँचाई पर चढ़कर दर्शन करते हैं।
गणेश पुराण के अनुसार देवी गिरिजा ने इसी गुफ़ा में बारह वर्षों की तपस्या की और गणेश यहाँ उनके पुत्र रूप में प्रकट हुए।
लेण्याद्री का गिरिजात्मज मंदिर अष्टविनायक का एकमात्र गुफ़ा मंदिर है। यह पर्वत की ऊँचाई पर उकेरी गई कंदरा में स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए लगभग 307 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। पर्वत से जुन्नर की घाटी का दृश्य बहुत मनोरम दिखता है।
परंपरा के अनुसार इस पर्वत पर गणेश की तपस्थली होने के कारण भक्त पैदल चढ़ाई को यात्रा का एक भाग मानते हैं। माघ चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर विशेष भीड़ देखी जाती है। आसपास की बौद्ध गुफ़ाएँ इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को भी दर्शाती हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। पर्वत की सीढ़ियाँ चढ़कर भक्त गुफ़ा तक पहुँचते हैं।
- सुबह और शाम आरती होती है। गणेश चतुर्थी पर यहाँ विशेष उत्सव होता है।
- चढ़ाई के समय पर्वत पर ठंडी हवा और शांत वातावरण मिलता है।
- माघ शुक्ल चतुर्थी पर यहाँ विशेष भीड़ होती है और पूरी रात भजन-कीर्तन होते हैं।