मुद्गल पुराण में बताया गया है कि विघ्नासुर नाम के एक असुर ने देवताओं और ऋषियों के सभी कार्यों में बाधा डालना शुरू कर दिया था। यज्ञ हो या पूजा, कोई भी कार्य पूरा नहीं हो पाता था। देवताओं ने गणेश की शरण ली।
मुद्गल पुराण के अनुसार गणेश ने विघ्नासुर के साथ युद्ध किया और उसे परास्त किया। विघ्नासुर ने हार मानकर गणेश के चरणों में प्रणाम किया। उसने गणेश से प्रार्थना की कि इस स्थान का नाम उसके नाम पर रखा जाए।
मुद्गल पुराण में आगे बताया गया है कि गणेश ने असुर की विनती सुनकर उसे क्षमा कर दिया और इस स्थान को उसके नाम से जोड़ने की अनुमति दी। जो स्वयं विघ्नासुर को हराए, वे विघ्नहर कहलाए — विघ्नों को हरने वाले।
परंपरा में कहा गया है कि ओझर का यह मंदिर अपने ताम्र-पत्र से मढ़े कलश-शिखर के लिए जाना जाता है। भक्त यहाँ अपने कार्यों के आरंभ में बाधाओं की निवृत्ति के भाव से दर्शन करते आए हैं।
मुद्गल पुराण के अनुसार गणेश ने यहाँ विघ्नासुर को परास्त किया और सभी देवताओं-ऋषियों के कार्यों की बाधाएँ दूर कीं।
ओझर का विघ्नहर मंदिर पुणे ज़िले के जुन्नर तालुका में कुकड़ी नदी के तट पर स्थित है। यह अष्टविनायक यात्रा का सातवाँ पड़ाव माना जाता रहा है। मंदिर का शिखर ताम्र-पत्र से मढ़ा हुआ है और दूर से चमकता दिखता है।
परंपरा के अनुसार भक्त यहाँ किसी नए कार्य के आरंभ से पहले दर्शन के लिए आते हैं। माघ चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर यहाँ विशेष भीड़ देखी जाती है। लेण्याद्री से ओझर की दूरी बहुत कम होने के कारण यात्री दोनों स्थल एक ही दिन में देखते हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।
- प्रतिदिन सुबह और शाम की आरती होती है। गणेश चतुर्थी पर विशेष उत्सव होता है।
- माघ शुक्ल चतुर्थी पर बड़ी संख्या में भक्त यहाँ आते हैं।
- लेण्याद्री और ओझर दोनों स्थल पास होने के कारण यात्री एक ही दिन में दोनों के दर्शन करते हैं।