गणेश पुराण के अनुसार त्रिपुरासुर नाम के एक असुर ने तीनों लोकों में उत्पात मचाया हुआ था। देवताओं की कोई भी शक्ति उसे रोकने में सफल नहीं हो रही थी। स्वयं भगवान शिव ने उसे परास्त करने का संकल्प लिया।
गणेश पुराण में बताया गया है कि ऋषियों और देवताओं ने शिव को स्मरण दिलाया — किसी भी कार्य के आरंभ में गणेश की आराधना आवश्यक है। शिव ने रांजणगाव के इसी स्थान पर गणेश की उपासना की। गणेश अपने महत् — विराट — दस-भुजी रूप में प्रकट हुए।
गणेश पुराण के अनुसार शिव को गणेश का अनुग्रह मिलने के बाद वे त्रिपुरासुर को परास्त कर सके और त्रिपुरारि कहलाए। यह परंपरा बताती है कि यहाँ के गणेश महागणपति — महान और विराट — रूप में विराजते हैं।
ऐसी मान्यता रही है कि अष्टविनायक यात्रा रांजणगाव पर आकर पूरी होती है। भक्त इसे यात्रा का विराम स्थल मानते हैं। मंदिर के भीतर गणेश की दस भुजाओं वाली प्रतिमा परंपरागत रूप से महत् स्वरूप की प्रतीक मानी जाती है।
गणेश पुराण के अनुसार स्वयं शिव ने यहाँ गणेश की उपासना की थी, तब गणेश अपने विराट दस-भुजी महागणपति रूप में प्रकट हुए।
रांजणगाव का महागणपति मंदिर पुणे-अहमदनगर मार्ग पर शिरूर तालुका में स्थित है। यह अष्टविनायक यात्रा का अंतिम पड़ाव माना जाता रहा है। परंपरा के अनुसार यात्री यहाँ दर्शन कर यात्रा को पूर्ण मानते हैं। मंदिर पूर्वाभिमुख है और पत्थर की सुंदर नक्काशी से सजा है।
परंपरा के अनुसार माघ चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर यहाँ विशेष भीड़ होती है। पुणे से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। भक्त यहाँ दर्शन कर यात्रा के समापन का भाव अनुभव करते हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।
- प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है। गणेश चतुर्थी पर बड़ा उत्सव होता है।
- माघ शुक्ल चतुर्थी पर यहाँ विशेष भीड़ देखी जाती है।
- यह यात्रा का अंतिम पड़ाव है — भक्त यहाँ दर्शन कर अपनी यात्रा को पूर्ण मानते हैं।