मुद्गल पुराण में बताया गया है कि एक बार भगवान विष्णु गहरी निद्रा में थे। उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। वे बड़े शक्तिशाली थे और उन्होंने सृष्टि को कष्ट देना शुरू कर दिया।
मुद्गल पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने विष्णु को जगाने का प्रयास किया, पर विष्णु नहीं जागे। तब यह समझा गया कि किसी दैवी शक्ति की सहायता चाहिए। विष्णु ने सिद्धटेक की पहाड़ी पर आकर गणेश जी की कठोर उपासना की।
मुद्गल पुराण में बताया गया है कि गणेश जी की कृपा से विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई। इसी सिद्धि के बल पर उन्होंने मधु-कैटभ का अंत कर सृष्टि को मुक्त किया। उस स्थान पर जहाँ विष्णु ने यह सिद्धि पाई, गणेश जी सिद्धिविनायक के रूप में विराजे।
ऐसी मान्यता रही है कि इस स्थान पर उपासना की परंपरा बहुत पुरानी है — यह विश्वास परंपरा से चला आ रहा है। परंपरा में यह भी कहा जाता है कि यहाँ की मूर्ति की सूँड दाईं ओर झुकी है, जो अष्टविनायक की अन्य मूर्तियों से अलग मानी जाती रही है।
मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने यहाँ गणेश जी की उपासना की और सिद्धि प्राप्त की।
सिद्धटेक भीमा नदी के किनारे एक छोटी पहाड़ी पर बसा है। परंपरा में यह स्थान इसलिए विशेष माना जाता रहा है क्योंकि यहाँ की गणेश मूर्ति की सूँड दाईं ओर झुकी हुई है। अष्टविनायक के आठ मंदिरों में यह एकमात्र ऐसी मूर्ति मानी जाती रही है जिसकी सूँड दाईं ओर है।
भीमा नदी का प्रवाह मंदिर के पास से गुजरता है। भक्त नदी में स्नान करके मंदिर में दर्शन करते हैं। अष्टविनायक यात्रा में सिद्धटेक का दूसरा स्थान है। कार्तिक और माघ माह में यहाँ विशेष भीड़ होती है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है।
- सुबह और शाम की आरती नियमित रूप से होती है।
- कार्तिक, माघ और भाद्रपद में भक्तों की संख्या विशेष रूप से बढ़ती है।
- भक्त भीमा नदी में स्नान करके दर्शन करते हैं — यह पुरानी परंपरा रही है।