गणेश पुराण के उपासना खण्ड के अनुसार, बहुत पुराने समय में सिंधु नाम का एक असुर था। वह बड़ा बलशाली था और उसने तीनों लोकों में उत्पात मचा रखा था। देवता उससे परेशान हो गए और उन्होंने भगवान गणेश की शरण ली।
गणेश पुराण में बताया गया है कि गणेश जी ने उस असुर का अंत करने के लिए मयूर — अर्थात मोर — पर सवार होकर युद्ध किया। सिंधु असुर का वध करने के बाद गणेश जी उसी स्थान पर विराजे। मोर पर विराजमान होने के कारण वे मयूरेश्वर कहलाए।
परंपरा में कहा गया है कि मोरगाव का नाम भी इसी मोर से आया है। मोर को संस्कृत में 'मयूर' कहते हैं, और 'गाव' मराठी में गाँव को कहते हैं। गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी यहाँ स्वयंभू रूप में — अर्थात अपने आप प्रकट हुए — माने जाते रहे हैं।
ऐसी मान्यता रही है कि अष्टविनायक यात्रा की शुरुआत और समाप्ति दोनों मोरगाव से ही होती है। भक्त पहले यहाँ दर्शन करते हैं, फिर बाकी सात स्थानों की यात्रा करते हैं, और अंत में फिर यहीं लौटते हैं।
गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी यहाँ मोर पर सवार होकर प्रकट हुए — इसीलिए वे मयूरेश्वर कहलाए।
मोरगाव का मयूरेश्वर मंदिर कर्हा नदी के किनारे बसा है। परंपरा में इसे अष्टविनायक यात्रा का केंद्र माना जाता रहा है। मंदिर की चहारदीवारी पर चार मीनारें हैं, और मुख्य द्वार के दोनों ओर बड़ी मूर्तियाँ हैं। यह स्थान महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में आता है।
भक्त दूर-दूर से यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। माघ चतुर्थी और भाद्रपद गणेश चतुर्थी के समय विशेष भीड़ देखी जाती है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल नंदी की प्रतिमा भी मानी जाती रही है जो इस स्थल की पुरातनता की ओर संकेत करती है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त रोज़ दर्शन के लिए आते हैं।
- माघ शुक्ल चतुर्थी और भाद्रपद गणेश चतुर्थी पर विशेष उत्सव होता है।
- प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है।
- अष्टविनायक यात्रा पर आने वाले भक्त सबसे पहले यहाँ दर्शन करते हैं।