मुद्गल पुराण में बताया गया है कि राजा रुक्मांगद एक भक्त राजा थे। वे गणेश जी के परम उपासक थे। एक बार उनके जीवन में बड़ा संकट आया। उन्होंने इसी स्थान पर आकर गणेश जी की उपासना की।
मुद्गल पुराण के अनुसार गणेश जी ने राजा रुक्मांगद को दर्शन दिए और उनकी मनोकामना पूरी की। 'वरद' का अर्थ है वर देने वाले। इसीलिए यहाँ के गणेश 'वरदविनायक' कहलाए।
परंपरा में कहा जाता है कि यहाँ की मूर्ति भूमि से प्रकट हुई — अर्थात स्वयंभू है। ऐसी मान्यता रही है कि यह मूर्ति एक तालाब में मिली थी और उसे यहाँ विराजित किया गया। मुद्गल पुराण के अनुसार यह स्थान गणेश जी की स्वयं की इच्छा से पवित्र हुआ।
परंपरा में यह भी माना जाता रहा है कि इस मंदिर में एक दीपक बहुत लंबे समय से अखंड जल रहा है। भक्त इसे बड़ी श्रद्धा से देखते हैं। यह दीपक मंदिर की पुरातनता और उपासना की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
मुद्गल पुराण के अनुसार यहाँ वर देने वाले गणेश विराजे हैं — वरदविनायक।
महड का वरदविनायक मंदिर रायगड ज़िले में सह्याद्रि की तलहटी में बसा है। परंपरा में यह माना जाता रहा है कि यहाँ का गणेश स्वरूप विशेष रूप से कृपालु है। 'वरद' — अर्थात वर देने वाला — यह नाम ही इस स्थान की उपासना परंपरा की झलक देता है।
मंदिर के भीतर जलने वाले अखंड दीपक का विशेष महत्व माना जाता रहा है। भक्त यहाँ आकर शांति और आशीर्वाद के भाव से दर्शन करते हैं। माघ चतुर्थी और भाद्रपद में विशेष उत्सव होता है। अष्टविनायक यात्रा में महड चौथा पड़ाव है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है।
- प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है।
- माघ शुक्ल चतुर्थी और भाद्रपद गणेश चतुर्थी पर विशेष उत्सव होता है।
- भक्त मंदिर के भीतर जलते अखंड दीपक के दर्शन करते हैं — यह परंपरा बहुत पुरानी मानी जाती है।