भागवत पुराण के दशम स्कंध में बताया गया है कि कृष्ण का बचपन वृन्दावन में बीता। यहाँ यशोदा माँ और नंदबाबा के घर वे पले-बढ़े। गाय चराते हुए वे अपने साथियों — गोप-बालकों — के साथ यमुना के किनारे और वन की पगडंडियों पर घूमते थे।
भागवत पुराण के अनुसार एक बार कृष्ण ने माखन चुराकर गोपियों के घर तक पहुँचा दिया। यशोदा माँ ने उन्हें पकड़ा और ऊखल से बाँधने की कोशिश की — पर हर बार रस्सी दो अंगुल छोटी रह जाती थी। यह प्रसंग भागवत पुराण में दामोदर-लीला के नाम से आता है।
दशम स्कंध में वर्णित है कि वृन्दावन के पास यमुना में एक बड़ा सर्प रहता था — कालिया। कृष्ण ने यमुना में कूदकर कालिया के फन पर नृत्य किया और उसे नदी छोड़कर जाने को कहा। यमुना का जल फिर निर्मल हो गया।
भागवत पुराण में गोवर्धन प्रसंग भी वृन्दावन से जुड़ा है। भारी वर्षा में कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर उठाकर गाँव वालों को आश्रय दिया। यह स्थान आज भी वृन्दावन से लगभग बाईस किलोमीटर दूर है। सरल आस्था के कहानियाँ खंड में कृष्ण बाल लीलाओं के कुछ प्रसंग उपलब्ध हैं।
भागवत पुराण के दशम स्कंध में वृन्दावन को कृष्ण की बाल लीलाओं की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है।
वृन्दावन परंपरागत रूप से वैष्णव तीर्थों में एक महत्वपूर्ण स्थान माना जाता रहा है। यमुना के किनारे बसे इस वन-क्षेत्र का उल्लेख भागवत पुराण में बार-बार आता है। भक्त यहाँ यमुना की परिक्रमा करते आए हैं और प्रातःकाल नदी तट पर दीपदान की परंपरा रही है।
वृन्दावन और मथुरा एक-दूसरे से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर हैं। दोनों नगरों की यात्रा परंपरा में एक साथ होती आई है। यमुना की इस परिक्रमा को 'ब्रज परिक्रमा' के रूप में जाना जाता है।
- परंपरा में भक्त यहाँ यमुना के तट पर प्रातःकाल दर्शन के लिए आते हैं। सूर्योदय के समय नदी तट पर दीप जलाने की परंपरा रही है।
- वृन्दावन परिक्रमा भक्तों में प्रचलित रही है। यह परिक्रमा यमुना के किनारे-किनारे होती है और लगभग आठ-दस किलोमीटर लंबी मानी जाती है।
- कार्तिक मास में यमुना स्नान और दीपदान की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित रही है। भागवत पुराण में कार्तिक का वृन्दावन से संबंध बताया गया है।
- वृन्दावन के मंदिरों में प्रातः और सायं आरती होती है। भक्त परंपरागत रूप से झाँकी दर्शन के समय उपस्थित रहते आए हैं।