उडुपी का श्री कृष्ण मठ 13वीं शताब्दी की परंपरा से जुड़ा माना जाता है। आचार्य मध्वाचार्य (1238–1317) द्वारा इस मठ की स्थापना की गई थी, ऐसा परंपरा में माना जाता रहा है।
मध्वाचार्य दक्षिण भारत के प्रसिद्ध वैष्णव आचार्यों में से एक थे। उन्होंने भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों पर भाष्य लिखे। उनकी दार्शनिक परंपरा को द्वैत वेदांत कहा गया है।
मंदिर की परंपरा के अनुसार मुख्य विग्रह बालकृष्ण का है — हाथ में मथने की रस्सी लिए हुए। यह विग्रह मंदिर के भीतर एक विशेष खिड़की से दिखाई देता है, जिसे कनकन खिंडी कहा जाता है।
उडुपी का श्री कृष्ण मठ 13वीं शताब्दी में आचार्य मध्वाचार्य की परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
उडुपी कर्नाटक के पश्चिमी तटीय क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी हरियाली, नारियल के पेड़ों और समुद्र तटों के लिए जाना जाता है। मंदिर का स्थापत्य दक्षिण भारत की पारंपरिक शैली में है।
मंदिर के आसपास कई मठ और अष्टमठ परंपरा के केंद्र हैं। मंदिर परिसर में एक छोटा सा सरोवर भी है, जिसे मधवा सरोवर कहा जाता है। परंपरा में भक्त इसमें स्नान कर के दर्शन के लिए जाते आए हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में भक्त कनकन खिंडी नामक विशेष खिड़की से मुख्य विग्रह के दर्शन करते हैं।
- मंदिर परिसर के मधवा सरोवर में स्नान की परंपरा रही है।
- उडुपी के आसपास के समुद्र तट और मालपे बंदरगाह भी दर्शनीय हैं।