ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, तिरुमला पर्वत पर भगवान विष्णु का निवास माना जाता रहा है। यहाँ स्थित सात पहाड़ियों को परंपरा में सप्तगिरि कहा जाता है। मंदिर सातवीं पहाड़ी वेंकटाद्रि पर स्थित है।
तमिल संगम काल के साहित्य में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। यह काल लगभग दो हज़ार वर्ष पुराना माना जाता है। उस समय से ही यह स्थान वैष्णव परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता आया है।
एक हज़ार वर्षों से अधिक समय से यहाँ निरंतर पूजा होती आई है। मंदिर का गर्भगृह द्रविड़ शैली में निर्मित है। मुख्य मूर्ति भगवान वेंकटेश्वर की है।
11वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य ने इस मंदिर की पूजा परंपरा को व्यवस्थित किया था। उनका संबंध दक्षिण भारत की वैष्णव परंपरा से रहा।
ब्रह्माण्ड पुराण में तिरुमला पर्वत को भगवान विष्णु के निवास के रूप में वर्णित किया गया है।
तिरुपति परंपरागत रूप से वैष्णव तीर्थों में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह भारत के सबसे अधिक भक्त-यात्रा वाले मंदिरों में से एक है — यहाँ प्रतिदिन लगभग पचास हज़ार भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
सात पहाड़ियों की यह श्रृंखला अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जानी जाती है। मंदिर परिसर के चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को एक विशेष अनुभव देता है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) द्वारा मंदिर का प्रबंधन होता है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते हैं।
- परंपरा में भक्त तिरुमला पहुँचने से पहले तिरुपति के निचले शहर में रुकते आए हैं।
- मंदिर परिसर में पारंपरिक रूप से प्रसाद के रूप में लड्डू वितरित किए जाते हैं।
- सुबह और शाम के समय मंदिर के घंटों की आवाज़ पूरे पर्वत पर सुनाई देती है।