स्कंद पुराण के अरुणाचल माहात्म्यम में यह कथा आती है — एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह प्रश्न उठा कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। दोनों अपने-अपने मत पर अडिग थे। तब शिव ने उनके बीच एक अनंत ज्योति-स्तम्भ के रूप में प्रकट होकर दोनों को चुनौती दी।
स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने हंस का रूप लिया और उस स्तम्भ का शिखर खोजने ऊपर उड़े। विष्णु ने वराह का रूप लिया और नीचे की ओर जड़ खोजने गए। न ब्रह्मा शिखर तक पहुँच सके, न विष्णु मूल तक। वह ज्योति-स्तम्भ अनंत था।
इसके बाद शिव ने स्वयं उस अनंत ज्योति का रहस्य प्रकट किया। स्कंद पुराण में बताया गया है कि वही ज्योति-स्तम्भ इस धरती पर अरुणाचल पर्वत के रूप में प्रकट हुआ। यह पर्वत स्वयं शिव का स्वरूप माना जाता है।
पंच भूत स्थलों की परंपरा में पाँच तत्वों — आकाश, वायु, जल, पृथ्वी और अग्नि — से जुड़े पाँच शिव तीर्थ हैं। तिरुवन्नामलै का अरुणाचलेश्वर मंदिर इनमें अग्नि तत्व का स्थल माना जाता है।
स्कंद पुराण के अरुणाचल माहात्म्यम में अरुणाचल पर्वत को शिव के अनंत ज्योति-स्तम्भ के साक्षात रूप में वर्णित किया गया है।
तिरुवन्नामलै का अरुणाचलेश्वर मंदिर पंच भूत स्थलों में अग्नि तत्व के तीर्थ के रूप में शैव परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। द्रविड़ शैली में निर्मित यह मंदिर परिसर अरुणाचल पर्वत की तलहटी में स्थित है। परंपरा में पर्वत और मंदिर — दोनों को एक साथ तीर्थ माना जाता है।
कार्तिगै दीपम के पर्व पर अरुणाचल पर्वत की चोटी पर एक विशाल दीप जलाने की परंपरा रही है। स्कंद पुराण के अरुणाचल माहात्म्यम में वर्णित ज्योति-स्तम्भ कथा से इस परंपरा का संबंध माना जाता है। यह पर्व तमिलनाडु में कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
- अरुणाचलेश्वर मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।
- गिरिवलम की परंपरा में भक्त अरुणाचल पर्वत की परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा लगभग चौदह किलोमीटर की है और पर्वत के चारों ओर बनी पक्की सड़क पर होती है।
- कार्तिगै दीपम के पर्व पर अरुणाचल पर्वत की चोटी पर पारंपरिक रूप से दीप जलाया जाता है। यह तमिलनाडु के प्रमुख शैव पर्वों में से एक माना जाता है।
- मंदिर परिसर द्रविड़ शैली की स्थापत्य कला का उदाहरण है। ऊँचे गोपुरम दूर से ही दिखाई देते हैं।