शैव परंपरा में बृहदीश्वर का अर्थ है — महान ईश्वर। यहाँ भगवान शिव बृहदीश्वर के रूप में पूजे जाते रहे हैं। तमिल में यह मंदिर 'पेरिय कोविल' अर्थात् बड़ा मंदिर कहलाता है।
लगभग 1010 ईस्वी में चोल काल में राजराज चोल प्रथम ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यह दक्षिण भारत के शैव मंदिरों में एक प्रमुख स्थान माना जाता रहा है। एक हज़ार वर्षों से अधिक समय से यहाँ शिव की निरंतर पूजा होती आई है।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक विशाल नंदी की मूर्ति है। यह मूर्ति एकल पत्थर को तराश कर बनाई गई मानी जाती है। भक्त पहले नंदी के दर्शन करते हैं, फिर भगवान शिव के पास जाते हैं।
स्थानीय परंपरा में कहा जाता है कि मंदिर के मुख्य विमानम की छाया दोपहर के समय भूमि पर नहीं पड़ती। यह बात चोल काल के कारीगरों की कुशलता की याद दिलाती है। सदियों से यह बात भक्तों और यात्रियों के बीच चर्चा में रही है।
एक हज़ार वर्षों से अधिक समय से बृहदीश्वर शिव यहाँ चोल शैव परंपरा के केंद्र में रहे हैं।
तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर चोल काल की शैव भक्ति परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। द्रविड़ शैली में बना यह मंदिर अपनी 216 फीट ऊँची विमानम संरचना के लिए जाना जाता है। विमानम के शीर्ष पर ग्रेनाइट का एक विशाल पत्थर रखा गया है।
कावेरी डेल्टा के इस क्षेत्र में सुबह के समय मंदिर की घंटियाँ दूर तक सुनाई देती हैं। भक्त यहाँ पारंपरिक प्रदक्षिणा करते हैं और नंदी व बृहदीश्वर शिव के दर्शन करते हैं। यह स्थान दक्षिण भारत के शैव तीर्थयात्रा मार्गों में शामिल रहा है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ प्रतिदिन बृहदीश्वर शिव के दर्शन के लिए आते हैं।
- परंपरा के अनुसार भक्त प्रवेश द्वार पर नंदी के दर्शन करते हैं। इसके बाद गर्भगृह में शिव के दर्शन होते हैं।
- मंदिर परिसर में पारंपरिक रूप से प्रदक्षिणा की जाती है। विमानम की भव्य छाया में चलना भक्तों को एक शांत अनुभव देता है।
- सुबह और शाम के समय मंदिर में विशेष पूजा होती है। उस समय घंटियों और वाद्य यंत्रों की आवाज़ परिसर में गूँजती है।