पद्म पुराण, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण — तीनों में प्रयाग माहात्म्य का प्रकरण आता है। इन ग्रंथों में प्रयाग को सबसे पुराने तीर्थों में गिना जाता रहा है।
महाभारत में भी प्रयाग का उल्लेख तीर्थ के रूप में मिलता है। यहाँ दो भौतिक नदियों — गंगा और यमुना — का संगम होता है। परंपरा में एक तीसरी नदी सरस्वती का भी इस संगम में मिलना माना जाता रहा है।
लगभग दो हज़ार वर्षों से यह स्थान निरंतर तीर्थ के रूप में पूजनीय रहा है। पुराण ग्रंथों में इसे तीर्थराज के नाम से भी पुकारा गया है।
पुराण ग्रंथों में प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है — गंगा, यमुना और परंपरागत सरस्वती के संगम का स्थान।
त्रिवेणी संगम भारत के चार कुंभ मेला स्थलों में से एक है। अन्य तीन हैं — हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। हर बारह वर्षों में यहाँ महा कुंभ मेला होता है, जो विश्व के सबसे बड़े शांतिपूर्ण धार्मिक समागमों में से एक माना जाता है।
संगम स्थल पर गंगा का साफ़ पानी और यमुना का गहरा पानी एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं — यह दृश्य अपने आप में विशेष है। तट पर अकबर का प्राचीन क़िला भी है, जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
- संगम स्थल वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ नौका से संगम तक जाते आए हैं।
- परंपरा में भक्त संगम पर स्नान कर के दान-पुण्य करते आए हैं।
- माघ मास में यहाँ विशेष माघ मेले की परंपरा रही है।
- हर बारह वर्ष में महा कुंभ मेला होता है। हर छह वर्ष में अर्ध कुंभ मेला।