स्कंद पुराण में पंढरपुर का उल्लेख विट्ठल के तीर्थ के रूप में आता है। परंपरा में विट्ठल को विष्णु और कृष्ण का ही एक स्वरूप माना जाता रहा है।
मंदिर भीमा नदी के तट पर स्थित है। यहाँ नदी का स्वरूप अर्धचंद्र की तरह है, इसलिए इसे चन्द्रभागा भी कहा जाता है। मुख्य मूर्ति में विट्ठल एक ईंट पर खड़े दिखाई देते हैं।
13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' नामक मराठी ग्रंथ रचा। इसमें भगवद्गीता की मराठी भाषा में व्याख्या है। यह ग्रंथ पंढरपुर परंपरा से जुड़ा माना जाता रहा है।
स्कंद पुराण में पंढरपुर को विट्ठल के तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है।
पंढरपुर महाराष्ट्र के सबसे पुराने वैष्णव तीर्थों में से एक माना जाता रहा है। मंदिर का स्थापत्य हेमाडपंती शैली का है, जो महाराष्ट्र की एक प्राचीन मंदिर निर्माण शैली है।
परंपरा में भक्त पैदल यात्रा करके पंढरपुर आते रहे हैं। यह पैदल यात्रा महाराष्ट्र की एक प्राचीन परंपरा रही है। मंदिर परिसर में कई मंडप और मुख्य गर्भगृह है, जहाँ विट्ठल और रुक्मिणी की मूर्तियाँ स्थापित हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में भक्त भीमा नदी में स्नान कर के मंदिर में दर्शन के लिए जाते आए हैं।
- आषाढ़ और कार्तिक मास में यहाँ विशेष पैदल यात्रा की परंपरा रही है।
- मंदिर परिसर में विट्ठल के साथ देवी रुक्मिणी का भी दर्शन होता है।