स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर पधारे। वे अपने साथ एक सुनहरा आम लेकर आए थे। यह आम साधारण फल नहीं था — इसे ज्ञान-फल कहा जाता था, ज्ञान का प्रतीक।
नारद जी ने वह फल भगवान शिव और माता पार्वती को भेंट किया। शिव जी के दो पुत्र थे — गणेश और मुरुगन (जिन्हें कार्तिकेय या सुब्रमण्यम भी कहते हैं)। दोनों पुत्रों ने उस फल को पाने की इच्छा प्रकट की। तब शिव जी ने एक शर्त रखी — जो पहले तीनों लोकों की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे यह फल मिलेगा।
मुरुगन तुरंत अपने वाहन मयूर पर सवार होकर उड़ चले। गणेश जी ने एक क्षण सोचा। फिर उन्होंने अपने माता-पिता — शिव और पार्वती — की तीन बार परिक्रमा की। और बोले, 'मेरे लिए आप ही तीनों लोक हैं।' शिव जी प्रसन्न हुए और गणेश को वह फल दे दिया।
मुरुगन जब परिक्रमा करके लौटे, तो उन्होंने देखा कि फल गणेश के पास है। वे व्यथित हुए और अपने सारे राज-आभूषण उतारकर पलनी पर्वत पर चले गए। वहाँ वे एक तपस्वी की तरह, हाथ में दंड (लाठी) लिए, रहने लगे। इसी रूप को दंडायुधपाणि कहते हैं — दंड धारण करने वाले। माता पार्वती उनके पास आईं और कहा, 'तुम स्वयं ही ज्ञान के फल हो — पलम-नी।' तमिल भाषा में पलम-नी का अर्थ है 'तुम ही फल हो।' इसी से इस स्थान का नाम पलनी पड़ा।
स्कंद पुराण में मुरुगन के इस तपस्वी रूप को दंडायुधपाणि कहा गया है — जो राज-वैभव त्यागकर, दंड लिए, पलनी पर्वत पर विराजे।
पलनी तमिलनाडु के उन स्थानों में से एक है जहाँ मुरुगन की उपासना अत्यंत प्राचीन काल से होती आई है। यहाँ देवता का स्वरूप तपस्वी का है — राज-आभूषण नहीं, साधारण दंड। यह स्वरूप भक्तों को विशेष रूप से प्रिय रहा है। पर्वत पर स्थित मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्त सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं।
मुरुगन को शिव-पार्वती के पुत्र के रूप में स्कंद पुराण में वर्णित किया गया है। दक्षिण भारत में उन्हें कार्तिकेय, सुब्रमण्यम और मुरुगन — तीनों नामों से पुकारा जाता है। पलनी उन छः प्रमुख स्थानों में गिना जाता है जो परंपरा में मुरुगन के आरु-पडई-वीडु (छः निवास) कहलाते हैं।
- मंदिर पलनी पर्वत की चोटी पर स्थित है। भक्त पत्थर की सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर दर्शन करते हैं।
- सुबह के समय जब पर्वत पर धुंध होती है, तो मंदिर की घंटियाँ दूर तक सुनाई देती हैं।
- परंपरा के अनुसार भक्त यहाँ दंडायुधपाणि के तपस्वी स्वरूप का दर्शन करते हैं — कोई राज-आभूषण नहीं, केवल सादगी।
- वर्ष भर भक्त यहाँ आते हैं। तैपूसम और पंगुनी उत्तिरम जैसे पर्वों पर विशेष रूप से भीड़ रहती है।