भागवत पुराण के दशम स्कंध में बताया गया है कि मथुरा नगरी यदुवंशी राजाओं की राजधानी थी। यहाँ के राजा कंस ने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में रखा था। कंस को एक भविष्यवाणी का भय था।
उस भविष्यवाणी में कहा गया था कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का अंत करेगा। कंस ने इसी डर के कारण देवकी और वसुदेव को बंदी बनाए रखा।
भागवत पुराण के अनुसार, भाद्रपद माह की कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उस रात घनघोर वर्षा हो रही थी और यमुना नदी में बाढ़ आई हुई थी। वसुदेव शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार कर गोकुल पहुँचे।
यमुना ने मार्ग दिया और वसुदेव नवजात शिशु को सुरक्षित गोकुल पहुँचाने में सफल रहे। यह जन्म-कथा भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है।
भागवत पुराण के दशम स्कंध में मथुरा को श्रीकृष्ण की जन्म नगरी के रूप में वर्णित किया गया है।
विष्णु पुराण में मथुरा को सप्त पुरियों में से एक माना गया है। ये सात नगरियाँ — अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका और द्वारका — परंपरा में विशेष तीर्थ नगरियाँ मानी जाती रही हैं। मथुरा का उल्लेख महाभारत में भी यदुवंशियों की राजधानी के रूप में आता है।
यमुना नदी के किनारे बसी यह नगरी सदियों से भक्त-यात्रियों का केंद्र रही है। यहाँ से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर वृन्दावन है, जहाँ श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन भागवत पुराण में मिलता है। दोनों नगरियाँ मिलकर इस क्षेत्र को ब्रज भूमि कहा जाता है।
- भक्त परंपरा से यमुना तट पर स्नान करते हैं और इसके बाद मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं।
- जन्माष्टमी के दिन मथुरा में विशेष उत्सव होता है। भागवत पुराण के अनुसार यही वह रात्रि है जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
- नगरी में अनेक प्राचीन मंदिर हैं जहाँ भक्त वर्ष भर दर्शन के लिए आते-जाते रहते हैं।
- इस कथा को पूरे विस्तार से पढ़ना हो तो हमारा कृष्ण जन्म कथा पृष्ठ देखें।