तमिल स्थल पुराण — तिरुविलैयाडल पुराणम — के अनुसार, मदुरै के प्राचीन पांड्य राजा मलयध्वज के घर एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ। उस कन्या को माता मीनाक्षी कहा गया। जन्म के समय से ही उनमें एक विशेष चिन्ह था। ज्योतिषियों ने कहा कि यह चिन्ह उनके सच्चे पति से मिलने पर स्वयं लुप्त हो जाएगा।
मीनाक्षी बड़ी होकर वीर योद्धा बनीं। वे अपनी सेना लेकर चारों दिशाओं में गईं। जब वे कैलाश पर्वत पहुँचीं, तो वहाँ भगवान शिव के दर्शन हुए। उसी क्षण वह विशेष चिन्ह लुप्त हो गया। मीनाक्षी को अनुभव हुआ कि यही उनके सच्चे पति हैं।
इसके बाद भगवान शिव ने सुंदरेश्वर का रूप धारण किया। वे मदुरै नगर में आए। यहाँ माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर का विवाह हुआ। इस विवाह को परंपरा में 'मीनाक्षी तिरुकल्याणम' कहते हैं।
यही कल्याणम मदुरै तीर्थ की केंद्रीय कथा मानी जाती रही है। तमिल स्थल पुराण परंपरा के अनुसार यह नगर अपने आप में देवी का स्थान माना जाता है। यहाँ माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर — दोनों की एक साथ पूजा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
तमिल स्थल पुराण परंपरा में मदुरै माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर के विवाह की पवित्र भूमि मानी जाती रही है।
मदुरै परंपरागत रूप से दक्षिण भारत की शाक्त और शैव दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यहाँ माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर का एक ही परिसर में दर्शन होता है। यह संयोग इस तीर्थ को विशिष्ट बनाता है।
वैगई नदी के किनारे बसे इस नगर में सुबह मंदिर की घंटियाँ दूर तक सुनाई देती हैं। मंदिर का द्रविड़ स्थापत्य और बहुरंगी गोपुरम इस परिसर की पहचान हैं। प्राचीन काल से यहाँ भक्त दूर-दूर से आते रहे हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ प्रतिदिन माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर के दर्शन के लिए आते हैं।
- प्रतिदिन सुबह और शाम पारंपरिक पूजा होती है। भक्त इन दोनों समय के दर्शन विशेष मानते आए हैं।
- चैत्र मास में यहाँ मीनाक्षी तिरुकल्याणम उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर के विवाह की स्मृति में परंपरागत रूप से मनाया जाता रहा है।
- मंदिर परिसर में कई मंडप हैं। भक्त परिसर के भीतर घूमकर विभिन्न देवालयों के दर्शन करते हैं।