ब्रह्म पुराण में सूर्य देव के विशेष तीर्थों का उल्लेख मिलता है। इनमें से एक तीर्थ पूर्वी समुद्र तट पर माना जाता रहा है, जिसे परंपरा में कोणादित्य कहा गया है।
स्कंद पुराण में भी कोणादित्य क्षेत्र का वर्णन आता है। परंपरा में यह माना जाता रहा है कि यह स्थान सूर्य की उपासना के लिए विशेष महत्व रखता है। 'कोण' अर्थात् कोना और 'अर्क' अर्थात् सूर्य — इन दो शब्दों से इस स्थान का नाम कोणार्क बना।
मंदिर का वर्तमान स्वरूप 13वीं शताब्दी में कलिंग शैली में निर्मित माना जाता रहा है। पूरे मंदिर को एक विशाल रथ के रूप में गढ़ा गया है। रथ में बारह पहिये और सात घोड़े हैं, जो पुराण परंपरा में सूर्य के रथ का पारंपरिक स्वरूप माना जाता रहा है।
परंपरा के अनुसार सूर्य का रथ बारह महीनों को दर्शाने वाले बारह पहियों और सप्ताह के सात दिनों के प्रतीक सात घोड़ों से युक्त है। कोणार्क का रथ रूप इसी पौराणिक कल्पना को पत्थर में रूपांतरित करता है।
ब्रह्म पुराण और स्कंद पुराण में कोणार्क को सूर्य देव के विशेष तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है।
कोणार्क का सूर्य मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल है। मंदिर का विशाल रथ रूप, उसके बारह पहिये और उन पर की गई पत्थर की कारीगरी — ये सब कलिंग स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।
मंदिर आज अपने पूर्ण रूप में नहीं है। समय के साथ इसका कुछ भाग क्षतिग्रस्त हो गया और आज भी जो शेष है वही देखने योग्य है। बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित होने के कारण यहाँ समुद्र और मंदिर की निकटता एक विशेष अनुभव देती है। पुरी और भुवनेश्वर — ओडिशा के दो अन्य प्रमुख स्थल भी इसी क्षेत्र में हैं।
- मंदिर परिसर वर्ष भर खुला रहता है और यात्री यहाँ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर बंगाल की खाड़ी के तट से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है।
- मंदिर के पत्थर पर की गई कारीगरी को निकट से देखना एक विशेष अनुभव है।
- सुबह सूर्योदय के समय मंदिर का दृश्य विशेष रूप से सुंदर माना जाता रहा है।