कनिपाकम विनायक मंदिर की कथा स्थानीय स्थल पुराण परंपरा में विस्तार से मिलती है। 11वीं शताब्दी की परंपरा से जुड़ा माना जाता है यह मंदिर।
परंपरा की कथा के अनुसार, प्राचीन काल में तीन भाई एक खेत में कुआँ खोद रहे थे। कथा में कहा जाता है कि ये तीनों भाई किसी-न-किसी प्रकार की शारीरिक कमी से पीड़ित थे। कुआँ खोदते समय उनकी कुल्हाड़ी किसी पत्थर से टकराई और वहाँ से लहू की बूँदें निकलने लगीं।
जब वे आगे खुदाई करते गए तो उन्हें गणेश की एक मूर्ति मिली — जो स्वयं पत्थर में से प्रकट हुई मानी जाती रही है। परंपरा के अनुसार उसी क्षण उन तीनों भाइयों की शारीरिक कमियाँ दूर हो गईं।
मंदिर परंपरा की एक विशेषता यह रही है कि गर्भगृह में मूर्ति कभी पानी में आंशिक रूप से डूबी रहती है। परंपरा में यह माना जाता रहा है कि यह मूर्ति धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है — इसी कारण गर्भगृह के आस-पास की संरचना समय-समय पर विस्तृत की जाती रही है।
स्थानीय परंपरा में कनिपाकम विनायक की मूर्ति को स्वयंभू और 'बढ़ती हुई' माना जाता रहा है।
कनिपाकम विनायक मंदिर दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध गणेश तीर्थों में से एक माना जाता रहा है। मंदिर का स्थापत्य द्रविड़ शैली का है। चित्तूर ज़िले के एक शांत गाँव में स्थित यह मंदिर अपने आस-पास के प्राकृतिक वातावरण के लिए भी जाना जाता है।
परंपरा में भक्त यहाँ 'सत्य प्रमाण' के लिए भी आते रहे हैं — अर्थात् विवादों और वादों को सुलझाने के लिए मंदिर में शपथ लेने की एक पुरानी परंपरा रही है। मंदिर के पास एक पुष्करिणी (तालाब) भी है, जिसमें स्नान की परंपरा रही है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- गर्भगृह में मूर्ति आंशिक रूप से पानी में रहती है — यह मंदिर की एक विशेषता रही है।
- मंदिर के पास की पुष्करिणी में स्नान की परंपरा रही है।
- परंपरा में भक्त यहाँ सत्य प्रमाण की शपथ लेते आए हैं।