कालिका पुराण में माता कामाख्या और नीलाचल पर्वत का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह पुराण असम क्षेत्र की प्राचीन शक्ति परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
पुराण परंपरा में शक्ति पीठों की कथा देवी सती से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, दक्ष के यज्ञ के प्रसंग के बाद देवी सती के शरीर के अंगों के जिन-जिन स्थानों पर पड़ने का वर्णन मिलता है, उन स्थानों को शक्ति पीठ कहा जाता रहा है।
कालिका पुराण के अनुसार नीलाचल पर्वत को इन्हीं प्राचीन पीठों में एक महत्वपूर्ण स्थान माना जाता रहा है। मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी के पास, ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट की एक पहाड़ी पर स्थित है।
मंदिर का स्थापत्य उत्तर-पूर्व भारत की एक विशेष शैली का है। मुख्य गर्भगृह के शिखर पर मधुमक्खी के छत्ते के आकार की विशेष आकृति देखी जा सकती है, जो इस मंदिर की एक पहचान रही है।
कालिका पुराण में नीलाचल पर्वत को माता कामाख्या के शक्ति पीठ के रूप में वर्णित किया गया है।
कामाख्या मंदिर उत्तर-पूर्व भारत के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण देवी तीर्थों में से एक माना जाता रहा है। मंदिर नीलाचल पर्वत पर स्थित है, और यहाँ से ब्रह्मपुत्र नदी और गुवाहाटी शहर का विस्तृत दृश्य दिखाई देता है।
परंपरा में भक्त मंदिर पहुँचने के लिए पर्वत की चढ़ाई करते आए हैं। आज पर्वत तक सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। मंदिर परिसर में कई छोटे-बड़े मंदिर हैं। देवी कामाख्या के साथ यहाँ अन्य देवियों के भी स्थान हैं, जो परंपरा में 'दश महाविद्या' नाम से जानी जाती रही हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- परंपरा में भक्त नीलाचल पर्वत की चढ़ाई कर के मुख्य मंदिर तक जाते हैं।
- मंदिर परिसर में मुख्य कामाख्या मंदिर के साथ अन्य कई छोटे मंदिर भी हैं।
- पहाड़ी के ऊपर से गुवाहाटी शहर और ब्रह्मपुत्र नदी का विस्तृत दृश्य दिखाई देता है।