देवी भागवत पुराण और कालिका पुराण के अनुसार, एक प्राचीन काल की बात है। दक्ष प्रजापति ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने भगवान शिव का अनादर किया। उनकी पुत्री सती — जो माँ पार्वती का पूर्व-जन्म रूप थीं — यह अपमान सह न सकीं। वे उसी यज्ञ की अग्नि में समा गईं।
भगवान शिव अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे सती को लिए ब्रह्मांड में भटकते रहे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 अंग अलग किए। जहाँ-जहाँ वे अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ बन गए।
कालिका पुराण की परंपरा के अनुसार, कालीघाट वह स्थान है जहाँ सती का एक अंग इस धरती पर गिरा। यहाँ आदि गंगा के तट पर माता काली का वास माना जाता है। वे भद्रकाली और दक्षिणकाली के रूप में पूजी जाती हैं।
माता काली का स्वरूप रौद्र दिखता है, पर भक्त उन्हें सदा रक्षक के रूप में जानते हैं। कालिका पुराण में उनका वर्णन है — वे देवताओं की रक्षा के लिए प्रकट हुईं। उनका रौद्र रूप अधर्म का अंत करने के लिए है, भक्तों की रक्षा के लिए है।
देवी भागवत पुराण और कालिका पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है — कालीघाट उनमें से एक पवित्र पीठ माना जाता है।
कालीघाट परंपरागत रूप से शाक्त परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। 51 शक्तिपीठों में यह पश्चिम बंगाल का एक प्रमुख तीर्थ है। आदि गंगा — जो हुगली नदी की एक पुरानी धारा है — के तट पर स्थित होने के कारण इस स्थान का अपना एक विशेष भूगोल भी है।
भक्त यहाँ दूर-दूर से माता के दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के भीतर फूल, दीप और प्रसाद चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। सुबह और शाम की आरती के समय मंदिर में घंटे और शंख की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है।
- मंदिर में भक्त माता काली को फूल, बेल के पत्ते और मिठाई चढ़ाते हैं।
- सुबह की आरती के समय दीप जलाए जाते हैं — परंपरागत रूप से यह दर्शन का विशेष समय माना जाता है।
- परंपरा के अनुसार भक्त दर्शन से पूर्व आदि गंगा के जल से स्नान करते आए हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। विशेष पर्वों पर भक्तों की संख्या अधिक होती है।