स्कंद पुराण के कालहस्ती माहात्म्य में बताया गया है कि इस स्थान का नाम तीन भक्तों के नामों से मिलकर बना है। श्री — एक मकड़ी, काल — एक सर्प, और हस्ती — एक हाथी। इन तीनों ने अपने-अपने तरीके से शिव की पूजा की।
स्कंद पुराण के अनुसार, हाथी नदी से जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करता था। सर्प अपने मणि-रत्न शिवलिंग पर अर्पित करता था। और मकड़ी धागे का जाल बुनकर शिवलिंग को धूप और वर्षा से बचाती थी। तीनों की भक्ति अलग-अलग थी, पर सच्ची थी।
स्कंद पुराण में वर्णित है कि शिव इन तीनों की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने तीनों को मोक्ष दिया। इसी से यह स्थान कालहस्ती कहलाया। स्कंद पुराण में एक भक्त शिकारी की कथा भी इसी तीर्थ से जुड़ी है — वे अपनी अनन्य भक्ति के लिए इस माहात्म्य में विख्यात हैं।
यह मंदिर पंच भूत स्थलों में वायु तत्व का प्रतिनिधि माना जाता रहा है। परंपरा में यहाँ के गर्भगृह में एक दीपक जलता रहता है जिसकी लौ बाहरी हवा के बिना भी हिलती रहती है। यह वायु तत्व का प्रतीक माना जाता है।
स्कंद पुराण में श्रीकालहस्ती को वायु तत्व का पंच भूत स्थल बताया गया है — जहाँ गर्भगृह की दीपक-लौ शिव की श्वास का संकेत मानी जाती है।
श्रीकालहस्ती दक्षिण भारत के पंच भूत स्थलों में से एक है। ये पाँच स्थल क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व से जुड़े माने जाते हैं। कालहस्ती वायु तत्व का स्थल है। इस परंपरा का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है।
स्वर्णमुखी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर प्राचीन द्रविड़ स्थापत्य शैली में बना है। मंदिर के चारों ओर का परिसर शांत और विशाल है। परंपरा में भक्त यहाँ राहु-केतु से जुड़ी पूजा के लिए भी आते आए हैं — यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त सुबह और शाम दोनों समय दर्शन के लिए आते हैं।
- परंपरा में भक्त गर्भगृह के भीतर जलते दीपक की लौ को देखते हैं — यह हिलती लौ वायु तत्व की उपस्थिति का संकेत मानी जाती है।
- परंपरा में राहु-केतु से जुड़ी पूजा यहाँ की जाती आई है। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है और दूर-दूर से भक्त इसके लिए आते हैं।
- मंदिर परिसर में स्वर्णमुखी नदी के घाट पर भक्त स्नान करते हैं। नदी के तट पर सुबह की शांति विशेष होती है।