तमिल स्थल पुराण की परंपरा के अनुसार, इस स्थान पर एक मकड़ी और एक हाथी — दोनों भगवान शिव के परम भक्त थे। हाथी प्रतिदिन नदी से जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करता था। मकड़ी उसी लिंग के ऊपर अपना जाल बुनती थी, ताकि धूप और धूल से रक्षा हो सके।
एक दिन हाथी ने देखा कि लिंग पर जाल बुना हुआ है। उसे लगा कि यह अपवित्रता है। उसने सूँड़ से जाल हटा दिया। मकड़ी को बड़ा दुख हुआ। वह फिर से जाल बुनती, हाथी फिर हटा देता। इस तरह दोनों के बीच टकराव होने लगा।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, भगवान शिव ने दोनों की निष्ठा देखी। उन्होंने दोनों को दर्शन दिए और दोनों को मोक्ष प्रदान किया। कथा यह बताती है कि भक्ति का कोई एक रूप नहीं होता — हर प्राणी अपने स्वभाव से शिव की सेवा करता है।
इस स्थान की एक और विशेषता है — यहाँ मंदिर के भीतर भूमि से प्राकृतिक जल-स्रोत निरंतर बहता रहता है। शिवलिंग उस जल से घिरा रहता है। इसी कारण यह स्थान पंच भूत स्थलों में जल तत्व का प्रतिनिधि माना जाता है।
यहाँ शिवलिंग के चारों ओर भूमि से निकले प्राकृतिक जल का निरंतर प्रवाह रहता है — यही इस स्थान को पंच भूत परंपरा में जल स्थल का स्थान देता है।
शैव परंपरा में पंच भूत स्थल वे पाँच स्थान हैं जहाँ शिव को पाँच तत्वों — आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — के रूप में माना जाता है। तमिलनाडु में स्थित इन स्थलों में से जम्बुकेश्वर जल तत्व का स्थल है। यह श्रीरंगम के ठीक निकट है, जो स्वयं एक प्रमुख वैष्णव तीर्थ है।
मंदिर परिसर में माता अखिलांडेश्वरी का मंदिर भी है। उन्हें इस स्थान की मूल देवी माना जाता है। मंदिर की स्थापत्य शैली द्रविड़ परंपरा की है। यहाँ वर्ष भर भक्त दर्शन के लिए आते हैं, विशेषकर शिवरात्रि और कार्तिक माह में।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। शिवरात्रि और कार्तिक माह में यहाँ विशेष पूजा होती है।
- मंदिर के भीतर जल-भरे क्षेत्र में शिवलिंग के दर्शन की परंपरा अपने आप में अनोखी है।
- भक्त परंपरागत रूप से पहले श्रीरंगम के दर्शन करते हैं, फिर यहाँ आते हैं — दोनों स्थल पास-पास हैं।
- सुबह की पूजा के समय मंदिर में मंत्रोच्चार और नादस्वरम की ध्वनि वातावरण को शांत बना देती है।