स्थानीय स्थल पुराण परंपरा के अनुसार, गुरुवायुर के मुख्य विग्रह का संबंध भगवान विष्णु के द्वापर युग के स्वरूप से जोड़ा जाता रहा है। परंपरा में यह विग्रह अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
एक प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार, देवगुरु बृहस्पति और वायु देव ने इस विग्रह को केरल के इसी स्थान पर स्थापित किया था। इसी कारण इस स्थान का नाम गुरुवायुर पड़ा — 'गुरु' (बृहस्पति) और 'वायु' के मिलन से।
मंदिर में मुख्य विग्रह बालकृष्ण के रूप में स्थापित है। इन्हें परंपरा में गुरुवायुरप्पन कहा जाता रहा है। विग्रह चार हाथों वाला है, जिनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं।
स्थानीय परंपरा के अनुसार गुरुवायुर का नाम देवगुरु बृहस्पति और वायु देव के नाम से आया है।
गुरुवायुर केरल के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थों में से एक माना जाता रहा है। मंदिर का स्थापत्य केरल की पारंपरिक शैली में है — ढलवां छत और लकड़ी के स्तंभों से युक्त।
मंदिर के चारों ओर एक विस्तृत प्रांगण है। परंपरा में भक्त प्रदक्षिणा करते हुए मुख्य गर्भगृह के दर्शन करते आए हैं। मंदिर परिसर के पास पुन्नथूर कोट्टा नामक हाथीशाला भी स्थित है, जहाँ मंदिर के हाथी रखे जाते हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर की परंपरा में दिन भर कई पूजा काल होते हैं — सुबह से रात तक।
- केरल की परंपरा के अनुसार मंदिर में प्रवेश के कुछ वस्त्र-नियम रहे हैं।
- मंदिर के पास पुन्नथूर कोट्टा हाथीशाला भी दर्शनीय स्थल है।