स्कंद पुराण के अनुसार, रावण ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। शिव ने उन्हें आत्म-लिंग — अपना स्वयं का लिंग — प्रदान किया। किंतु एक शर्त थी: यह लिंग लंका पहुँचने से पहले धरती पर नहीं रखा जाना चाहिए।
रावण आत्म-लिंग लेकर दक्षिण की ओर चले। देवताओं को चिंता हुई कि यदि यह लिंग लंका पहुँच गया, तो रावण अपराजेय हो जाएँगे। तब भगवान गणेश ने एक ग्वाले के बालक का रूप लेकर गोकर्ण के पास रावण को रोका।
संध्याकाल में रावण को अपनी दैनिक पूजा करनी थी। उन्होंने उस बालक से लिंग थामने को कहा। बालक ने कहा — 'यदि यह भारी हो जाए तो मैं रख दूँगा।' रावण के लौटने से पहले ही लिंग धरती पर रख दिया गया।
रावण ने लिंग उठाने का बहुत प्रयास किया। लिंग का ऊपरी भाग थोड़ा मुड़ गया — इसीलिए इसे महाबलेश्वर कहा जाता है। वह आत्म-लिंग आज भी गोकर्ण में स्थापित है।
स्कंद पुराण में गोकर्ण के महाबलेश्वर लिंग को आत्म-लिंग बताया गया है — शिव का स्वयं का लिंग।
गोकर्ण परंपरागत रूप से शैव तीर्थों में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। पुरानी परंपरा में इसे सप्त मुक्ति स्थलों में से एक माना जाता रहा है। अरब सागर के तट पर स्थित होने के कारण यहाँ तटीय तीर्थ-स्नान की भी पुरानी परंपरा है।
गोकर्ण नाम की एक व्याख्या स्कंद पुराण में मिलती है — परंपरा के अनुसार यहाँ शिव गाय के कान (गो-कर्ण) से प्रकट हुए थे। मंदिर की सुबह की आरती के समय समुद्र का शांत वातावरण और घंटियों की आवाज़ एक साथ सुनाई देती है।
- महाबलेश्वर मंदिर में भक्त प्रतिदिन सुबह और शाम दर्शन के लिए आते हैं।
- परंपरा में तीर्थ-स्नान के लिए भक्त अरब सागर के तट पर जाते हैं।
- मंदिर के गर्भगृह में स्थापित आत्म-लिंग के दर्शन के लिए श्रावण मास में अधिक भक्त आते हैं।
- सुबह की आरती के समय मंदिर परिसर में शंख और घंटियों की ध्वनि सुनाई देती है।