वायु पुराण और गरुड़ पुराण में गयासुर की कथा आती है। गयासुर एक तपस्वी असुर थे जिनकी भक्ति से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की कि देवता भी चकित हो गए।
वायु पुराण के अनुसार, गयासुर ने विष्णु से वरदान माँगा कि जो भी उनके शरीर का स्पर्श करे, वह पवित्र हो जाए। परंतु इससे पाप कर्म करने वाले लोग भी आसानी से पवित्र होने लगे। देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता माँगी।
विष्णु ने अपना चरण गयासुर के शरीर पर रख दिया और उन्हें भूमि में स्थिर कर दिया। गयासुर ने यह वरदान माँगा कि यह स्थान उनके पूर्वजों की मुक्ति के लिए तीर्थ बने। विष्णु ने यह माँग स्वीकार की। जहाँ उनका चरण पड़ा, वह स्थान विष्णुपद कहलाया।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि गया पितृ तीर्थ के रूप में विशेष माना जाता रहा है। परंपरा में माना जाता रहा है कि यहाँ फल्गु नदी के तट पर पूर्वजों के निमित्त अनुष्ठान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आई है।
वायु पुराण में गया को पितृ तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है — यहाँ विष्णु के चरण-चिह्न की परंपरा गयासुर कथा से जुड़ी है।
गया परंपरागत रूप से पितृ तीर्थ के रूप में जाना जाता रहा है। वायु पुराण और गरुड़ पुराण में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। यहाँ फल्गु नदी के तट पर पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और पिंड-दान की परंपरा सदियों से चली आई है — परंपरा में माना जाता रहा है कि यह अनुष्ठान पूर्वजों की स्मृति को श्रद्धा से जोड़ता है।
विष्णुपद मंदिर इस क्षेत्र का केंद्रीय स्थान माना जाता रहा है। यहाँ से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर बोधगया स्थित है जो बौद्ध परंपरा का एक अलग और महत्वपूर्ण तीर्थ है। गया और बोधगया दोनों अपनी-अपनी परंपराओं में अलग पहचान रखते हैं।
- विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण-चिह्न के रूप में पूजा की परंपरा रही है। भक्त यहाँ मंदिर की परिक्रमा करते हैं।
- फल्गु नदी के तट पर श्राद्ध और पिंड-दान की परंपरा सदियों से चली आई है। परंपरा में माना जाता रहा है कि यह अनुष्ठान पूर्वजों की स्मृति को श्रद्धांजलि देने का एक रूप है।
- फल्गु नदी में स्नान की परंपरा भी यहाँ प्राचीन काल से रही है। नदी का यह तट पितृ पक्ष के समय विशेष रूप से जीवंत होता है।
- मंदिर परिसर में सुबह-शाम आरती होती है। पत्थर पर उकेरे गए चरण-चिह्न को परंपरागत रूप से विष्णुपद माना जाता रहा है।