गणेश तीर्थ

गणपतिपुले

कोंकण समुद्र तट पर स्थित स्वयंभू गणेश तीर्थ
📍 गणपतिपुले, रत्नागिरि ज़िला, महाराष्ट्र
स्थान
रत्नागिरि ज़िला, कोंकण, महाराष्ट्र
देवता
भगवान गणेश (स्वयंभू)
विशेष
अरब सागर के तट पर
📖 स्थानीय माहात्म्य परंपरा

स्थानीय माहात्म्य परंपरा के अनुसार गणपतिपुले की मूर्ति स्वयंभू है — अर्थात् परंपरा में यह माना जाता रहा है कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई। मंदिर कोंकण क्षेत्र के रत्नागिरि ज़िले में अरब सागर के तट पर स्थित है।

परंपरा के अनुसार यहाँ की गणेश मूर्ति रेत और पत्थर के संगम से स्वयं बनी हुई है। मूर्ति पश्चिम की ओर मुख किए हुए है — इसी कारण परंपरा में इसे 'पश्चिम द्वार देवता' भी कहा जाता रहा है।

कोंकण क्षेत्र में गणेश की उपासना की परंपरा बहुत पुरानी रही है। मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में कोंकण क्षेत्र के गणेश तीर्थों का सामान्य रूप से उल्लेख मिलता है। गणपतिपुले को स्थानीय परंपरा में इन्हीं पुराने स्थलों में से एक माना जाता रहा है।

स्थानीय परंपरा में गणपतिपुले की मूर्ति को स्वयंभू और 'पश्चिम द्वार देवता' माना जाता रहा है।

गणपतिपुले भारत के उन दुर्लभ गणेश तीर्थों में से एक है जो समुद्र तट पर स्थित है। मंदिर और अरब सागर के बीच की दूरी बहुत कम है। मंदिर परिसर से समुद्र तट सीधा दिखाई देता है।

मंदिर के पीछे एक छोटी सी पहाड़ी है। परंपरा में भक्त मंदिर की परिक्रमा इसी पहाड़ी के चारों ओर करते आए हैं — इसे 'प्रदक्षिणा मार्ग' कहा जाता रहा है। यह मार्ग लगभग एक किलोमीटर लंबा है।

स्थान
अरब सागर के तट पर
मूर्ति
स्वयंभू — रेत और पत्थर में से प्रकट
मुख
पश्चिम द्वार देवता
परिक्रमा मार्ग
मंदिर के पीछे पहाड़ी के चारों ओर
✈️
हवाई मार्ग
रत्नागिरि हवाई अड्डा लगभग 45 किलोमीटर दूर है। मुंबई हवाई अड्डा लगभग 375 किलोमीटर पर पड़ता है।
🚂
रेल मार्ग
रत्नागिरि रेलवे स्टेशन लगभग 45 किलोमीटर दूर है। कोंकण रेलवे के मार्ग पर स्थित।
🚗
सड़क मार्ग
रत्नागिरि से लगभग 45 किलोमीटर, मुंबई से लगभग 375 किलोमीटर, पुणे से लगभग 330 किलोमीटर। महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बसें चलती हैं।
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विशेष
कोंकण का यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक हरियाली और नारियल के पेड़ों के लिए भी जाना जाता रहा है।