स्थानीय माहात्म्य परंपरा के अनुसार गणपतिपुले की मूर्ति स्वयंभू है — अर्थात् परंपरा में यह माना जाता रहा है कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई। मंदिर कोंकण क्षेत्र के रत्नागिरि ज़िले में अरब सागर के तट पर स्थित है।
परंपरा के अनुसार यहाँ की गणेश मूर्ति रेत और पत्थर के संगम से स्वयं बनी हुई है। मूर्ति पश्चिम की ओर मुख किए हुए है — इसी कारण परंपरा में इसे 'पश्चिम द्वार देवता' भी कहा जाता रहा है।
कोंकण क्षेत्र में गणेश की उपासना की परंपरा बहुत पुरानी रही है। मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में कोंकण क्षेत्र के गणेश तीर्थों का सामान्य रूप से उल्लेख मिलता है। गणपतिपुले को स्थानीय परंपरा में इन्हीं पुराने स्थलों में से एक माना जाता रहा है।
स्थानीय परंपरा में गणपतिपुले की मूर्ति को स्वयंभू और 'पश्चिम द्वार देवता' माना जाता रहा है।
गणपतिपुले भारत के उन दुर्लभ गणेश तीर्थों में से एक है जो समुद्र तट पर स्थित है। मंदिर और अरब सागर के बीच की दूरी बहुत कम है। मंदिर परिसर से समुद्र तट सीधा दिखाई देता है।
मंदिर के पीछे एक छोटी सी पहाड़ी है। परंपरा में भक्त मंदिर की परिक्रमा इसी पहाड़ी के चारों ओर करते आए हैं — इसे 'प्रदक्षिणा मार्ग' कहा जाता रहा है। यह मार्ग लगभग एक किलोमीटर लंबा है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है और भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर अरब सागर के तट पर है — समुद्र तट सीधा मंदिर से दिखाई देता है।
- मंदिर के पीछे पहाड़ी की परिक्रमा की परंपरा रही है।
- गणेश चतुर्थी के समय यहाँ विशेष परंपरा देखी जाती रही है।