शिव पुराण और काञ्ची माहात्म्यम में एक कथा वर्णित है। एक बार माँ पार्वती ने खेल में अपने दोनों हाथों से भगवान शिव के नेत्र ढक दिए। उस एक पल में तीनों लोकों में अंधकार छा गया। शिव ने पार्वती को इस भूल के प्रायश्चित के लिए पृथ्वी पर तपस्या करने को कहा।
पार्वती वेगावती नदी के तट पर काञ्चीपुरम आईं। वहाँ एक प्राचीन आम्रवृक्ष के नीचे उन्होंने अपने हाथों से पृथ्वी का एक शिव-लिंग बनाया और उसकी पूजा शुरू की। यह मिट्टी का लिंग था — पंच भूतों में पृथ्वी तत्व का प्रतीक।
एक दिन वेगावती नदी में भारी बाढ़ आई। जल उस मिट्टी के लिंग को बहाने लगा। पार्वती ने उसे अपनी बाँहों से जकड़ लिया और अपने शरीर से ढककर उसकी रक्षा की। शिव पार्वती की इस अटूट भक्ति से द्रवित हो उठे। वे प्रकट हुए और उनका पुनर्मिलन हुआ।
काञ्ची माहात्म्यम की परंपरा में कहा जाता रहा है कि उस आलिंगन के चिह्न आज भी लिंग पर दिखते हैं। वह प्राचीन आम्रवृक्ष आज भी मंदिर परिसर में खड़ा है — कथा का जीवित साक्षी।
शिव पुराण और काञ्ची माहात्म्यम में एकाम्बरेश्वर को पंच भूत स्थलों में पृथ्वी तत्व का तीर्थ माना गया है। यहाँ का लिंग मिट्टी से बना है।
तमिल शैव परंपरा में पाँच विशेष स्थलों को पंच भूत स्थल कहा जाता रहा है — जहाँ शिव पाँच महाभूतों के रूप में पूजे जाते हैं। एकाम्बरेश्वर मंदिर इनमें पृथ्वी तत्व का स्थल माना जाता है। यहाँ के लिंग पर सीधे जल-अभिषेक की परंपरा नहीं रही — पृथ्वी के मिट्टी-रूप को जल से न बहाने की यह परंपरा इस स्थल की विशेषता रही है।
मंदिर परिसर विस्तृत है और द्रविड़ स्थापत्य शैली में बना है। इसमें ऊँचे गोपुरम और अनेक प्रांगण हैं। परिसर में वह आम्रवृक्ष आज भी विद्यमान है जिसके नीचे पार्वती ने तपस्या की थी — इसे परंपरा में 'पंचम्रवृक्ष' कहा जाता रहा है।
- भक्त यहाँ एकाम्बरेश्वर के दर्शन के लिए आते रहे हैं — पृथ्वी तत्व के इस लिंग की पूजा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
- परंपरा में यहाँ के लिंग पर सीधे जल-अभिषेक नहीं किया जाता — मिट्टी के लिंग की यह विशेषता भक्तों के लिए इस स्थल को और विशेष बनाती है।
- मंदिर परिसर में वह प्राचीन आम्रवृक्ष है जिसके नीचे पार्वती ने तपस्या की थी। भक्त इस वृक्ष के दर्शन भी करते हैं।
- मंदिर के ऊँचे गोपुरम दूर से दिखते हैं। परिसर के भीतर कई छोटे-छोटे प्रांगण और उप-देवताओं के मंदिर भी हैं।