परंपरा में अमरनाथ गुफा का संबंध शिव-पार्वती के एक विशेष संवाद से जोड़ा जाता रहा है, जिसे 'अमर कथा' के नाम से जाना गया है। कथा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाने के लिए इसी एकांत गुफा को चुना था।
कश्मीर क्षेत्र के नीलमत पुराण में इस क्षेत्र के कई पवित्र स्थलों का उल्लेख मिलता है। परंपरा में अमरनाथ की गुफा को इन्हीं प्राचीन शैव स्थलों में से एक माना जाता रहा है।
गुफा के भीतर हर वर्ष प्राकृतिक रूप से हिम से बना एक लिंग बनता है। परंपरा में इसे स्वयंभू लिंग माना जाता रहा है। लिंग का आकार चंद्रमा की कलाओं के साथ बदलता है — यह एक प्राकृतिक घटना है जो इस स्थान की विशेषता रही है।
गुफा लगभग 3888 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ वर्ष भर पहुँचना संभव नहीं है — केवल गर्मियों के कुछ महीनों में ही यात्रा का मार्ग खुलता है।
परंपरा में अमरनाथ गुफा को 'अमर कथा' के स्थान के रूप में जाना जाता रहा है — जहाँ शिव ने पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाया।
अमरनाथ की यात्रा भारत के सबसे कठिन तीर्थ मार्गों में से एक मानी जाती रही है। गुफा तक पहुँचने के लिए दो पारंपरिक मार्ग हैं — पहलगाम से और बालटाल से। दोनों मार्ग पहाड़ी और कठिन हैं।
गुफा के भीतर प्राकृतिक हिम लिंग का दर्शन भक्तों के लिए एक विशेष अनुभव माना जाता रहा है। यात्रा का मार्ग बर्फीले पहाड़ों, घाटियों और ठंडी हवाओं से होकर गुज़रता है। यात्रा केवल गर्मियों में खुलती है, प्रायः जुलाई से अगस्त के महीनों में।
- गुफा केवल गर्मियों के कुछ महीनों में यात्रा के लिए खुलती है।
- पहलगाम से गुफा तक का मार्ग लगभग 46 किलोमीटर है।
- बालटाल से गुफा तक का मार्ग छोटा है — लगभग 14 किलोमीटर — पर खड़ी चढ़ाई है।
- यात्रा में घोड़े, पालकी और पैदल — तीनों विकल्प परंपरागत रूप से उपलब्ध रहे हैं।