यह विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का अन्तिम भाग है। इसमें भगवान, व्यास, अर्जुन, शिव, पार्वती, ब्रह्मा और सञ्जय — सबके वचन उद्धृत हैं। क्षमा-प्रार्थना और समापन-श्लोक के साथ स्तोत्र पूर्ण होता है।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
101
श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम इति ।
श्रीभगवानुवाच —
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
अनन्याः
एकनिष्ठ
चिन्तयन्तः
चिन्तन करते हुए
माम्
मेरा
ये जनाः
जो लोग
पर्युपासते
उपासना करते हैं
तेषाम्
उनका
नित्याभियुक्तानाम्
सदा मुझमें लगे हुओं का
योगक्षेमम्
अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा
वहामि अहम्
मैं वहन करता हूँ
भगवान कहते हैं — जो एकनिष्ठ होकर मेरा चिन्तन और उपासना करते हैं, सदा मुझमें लगे रहते हैं — उनके योगक्षेम (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।
102
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
परित्राणाय
रक्षा के लिए
साधूनाम्
सज्जनों की
विनाशाय
विनाश के लिए
दुष्कृताम्
दुष्कर्मियों के
धर्मसंस्थापनार्थाय
धर्म की स्थापना के लिए
सम्भवामि
मैं प्रकट होता हूँ
युगे युगे
प्रत्येक युग में
भगवान कहते हैं — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ। यह गीता 4.8 का प्रसिद्ध श्लोक है।
103
आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः
घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं
विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ॥
आर्ताः
दुखी
विषण्णाः
निराश — उदास
शिथिलाः
शिथिल — थके हुए
भीताः
भयभीत
घोरेषु व्याधिषु
भयंकर रोगों में
वर्तमानाः
लगे हुए
सङ्कीर्त्य
संकीर्तन करके
नारायणशब्दमात्रम्
केवल नारायण शब्द
विमुक्तदुःखाः
दुखों से मुक्त
सुखिनः भवन्ति
सुखी हो जाते हैं
दुखी, निराश, शिथिल, भयभीत और भयंकर रोगों से पीड़ित लोग — केवल नारायण शब्द का संकीर्तन करके दुखों से मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं।
104
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि ॥
कायेन
शरीर से
वाचा
वाणी से
मनसा
मन से
इन्द्रियैः
इन्द्रियों से
बुद्ध्या
बुद्धि से
आत्मना
आत्मा से
प्रकृतेः स्वभावात्
प्रकृति के स्वभाव से
करोमि
करता हूँ
यद्यत् सकलम्
जो-जो सब कुछ
परस्मै नारायणाय
परम नारायण को
इति समर्पयामि
इस प्रकार समर्पित करता हूँ
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियों, बुद्धि, आत्मा या प्रकृति के स्वभाव से — मैं जो-जो कुछ भी करता हूँ, वह सब परम नारायण को समर्पित करता हूँ।
105
यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥
यत्
जो
अक्षरपदभ्रष्टम्
अक्षर या पद में भूल
मात्राहीनम्
मात्रा (उच्चारण) में कमी
तु यत् भवेत्
जो भी हो
तत् सर्वम्
वह सब
क्षम्यताम्
क्षमा करें
देव
हे देव
नारायण
हे नारायण
नमः अस्तु ते
आपको नमस्कार
पाठ में जो अक्षर, पद या मात्रा की भूल हो गई हो — वह सब क्षमा करें, हे देव नारायण! आपको नमस्कार।
106
विसर्गबिन्दुमात्राणि पदपादाक्षराणि च ।
न्यूनानि चातिरिक्तानि क्षमस्व पुरुषोत्तम ॥
विसर्गबिन्दुमात्राणि
विसर्ग, बिन्दु और मात्राएँ
पदपादाक्षराणि
पद, चरण और अक्षर
न्यूनानि
कम हो गये हों
अतिरिक्तानि
अधिक हो गये हों
क्षमस्व
क्षमा करें
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम
विसर्ग, बिन्दु, मात्राएँ, पद, चरण और अक्षरों में जो कम या अधिक हो गया हो — हे पुरुषोत्तम, कृपया क्षमा करें।
107
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायाम्
वैयासिक्यामानुशासनिके पर्वणि
भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे
श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
श्रीमहाभारते
श्रीमहाभारत में
शतसाहस्र्यां संहितायाम्
एक लाख (श्लोकों की) संहिता में
वैयासिक्याम्
व्यास-रचित
आनुशासनिके पर्वणि
अनुशासन पर्व में
भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे
भीष्म-युधिष्ठिर संवाद में
श्रीविष्णोः
श्रीविष्णु का
दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम्
दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र
सम्पूर्णम्
सम्पूर्ण हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत की एक लाख श्लोकों वाली व्यास-रचित संहिता के अनुशासन पर्व में भीष्म-युधिष्ठिर संवाद में श्रीविष्णु का दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 11 / 11