इस भाग में फल-श्रुति जारी है। ब्रह्मा, शिव, व्यास, अर्जुन, भगवान और सञ्जय — सबके वचन उद्धृत हैं। शिव ने पार्वती को बताया कि राम-नाम सहस्रनाम के तुल्य है। अन्त में गीता का प्रसिद्ध श्लोक आता है — जहाँ कृष्ण और अर्जुन, वहाँ श्री और विजय।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
91
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥
एकः
एक — अद्वितीय
विष्णुः
सर्वव्यापी
महद्भूतम्
महान तत्त्व
पृथग्भूतानि
पृथक-पृथक प्राणी
अनेकशः
अनेक प्रकार से
त्रीन् लोकान्
तीनों लोकों को
व्याप्य
व्याप्त करके
भूतात्मा
प्राणियों की आत्मा
भुङ्क्ते
भोग करते हैं
विश्वभुक्
विश्व का भोग करने वाले
अव्ययः
अविनाशी
एक अद्वितीय विष्णु महान तत्त्व हैं और अनेक प्रकार के पृथक प्राणी बनते हैं। तीनों लोकों को व्याप्त करके, प्राणियों की आत्मा बनकर वे विश्व का भोग करते हैं — अविनाशी रहते हुए।
92
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥
इमम् स्तवम्
इस स्तुति को
भगवतः विष्णोः
भगवान विष्णु की
व्यासेन
व्यास द्वारा
कीर्तितम्
गाया गया
पठेत्
पढ़े
यः इच्छेत्
जो चाहे
पुरुषः
मनुष्य
श्रेयः
कल्याण
सुखानि
सुख
भगवान विष्णु की यह स्तुति व्यास ऋषि द्वारा गायी गयी है। जो मनुष्य कल्याण और सुख चाहता है, वह इसे पढ़े।
93
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥
विश्वेश्वरम्
विश्व के ईश्वर
अजम्
अजन्मा
देवम्
देव
जगतः
जगत के
प्रभवाप्ययम्
उत्पत्ति और प्रलय के कारण
भजन्ति
भजते हैं
ये
जो
पुष्कराक्षम्
कमलनयन को
न ते यान्ति
वे नहीं प्राप्त करते
पराभवम्
पराजय
जो विश्वेश्वर, अजन्मा, जगत की उत्पत्ति और प्रलय के कारण, कमलनयन भगवान को भजते हैं — वे कभी पराजित नहीं होते।
94
न ते यान्ति पराभवम् ॐ नम इति ।
अर्जुन उवाच —
पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥
पद्मपत्रविशालाक्ष
कमलदल के समान विशाल नेत्र वाले
पद्मनाभ
कमल-नाभि वाले
सुरोत्तम
देवताओं में श्रेष्ठ
भक्तानाम्
भक्तों के
अनुरक्तानाम्
अनुरागी — प्रेमी
त्राता भव
रक्षक बनिये
जनार्दन
हे जनार्दन
अर्जुन कहते हैं — हे कमलनयन, पद्मनाभ, देवश्रेष्ठ जनार्दन! अपने अनुरागी भक्तों के रक्षक बनिये।
95
श्रीभगवानुवाच —
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥
यः
जो
माम्
मुझे
नामसहस्रेण
सहस्र नामों से
स्तोतुम्
स्तुति करना
इच्छति
चाहता है
पाण्डव
हे अर्जुन
सः अहम्
वह मैं
एकेन श्लोकेन
एक श्लोक से ही
स्तुतः एव
स्तुति किया हुआ ही हूँ
न संशयः
इसमें सन्देह नहीं
भगवान कहते हैं — हे अर्जुन! जो मुझे सहस्र नामों से स्तुति करना चाहता है, उसके एक श्लोक से ही मैं स्तुति किया हुआ हूँ — इसमें सन्देह नहीं।
96
स्तुत एव न संशय ॐ नम इति ।
व्यास उवाच —
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥
वासनात्
निवास करने के कारण
वासुदेवस्य
वासुदेव के
वासितम्
व्याप्त है — बसा हुआ है
भुवनत्रयम्
तीनों लोक
सर्वभूतनिवासः
सब प्राणियों में निवास करने वाले
असि
आप हैं
वासुदेव
हे वासुदेव
नमः अस्तु ते
आपको नमस्कार
व्यास कहते हैं — वासुदेव के निवास करने से तीनों लोक व्याप्त हैं। हे वासुदेव! आप सब प्राणियों में निवास करने वाले हैं — आपको नमस्कार।
97
वासुदेव नमोऽस्तु ते इति ।
पार्वत्युवाच —
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
केन उपायेन
किस उपाय से
लघुना
सरल (लघु)
विष्णोः
विष्णु के
नामसहस्रकम्
सहस्र नाम
पठ्यते
पढ़ा जाता है
पण्डितैः
पण्डितों द्वारा
नित्यम्
प्रतिदिन
श्रोतुम् इच्छामि
सुनना चाहती हूँ
प्रभो
हे प्रभु
पार्वती पूछती हैं — हे प्रभु! किस सरल उपाय से पण्डितजन प्रतिदिन विष्णु के सहस्र नामों का पाठ करते हैं? मैं यह सुनना चाहती हूँ।
98
ईश्वर उवाच —
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
श्रीराम राम राम
श्रीराम, राम, राम
इति
इस प्रकार
रमे
मैं रमण करता हूँ
रामे
राम में
मनोरमे
मनोहर
सहस्रनाम तत्तुल्यम्
सहस्रनाम के तुल्य
रामनाम
राम का नाम
वरानने
हे सुन्दर मुख वाली
शिव कहते हैं — हे सुन्दरी! श्रीराम, राम, राम — इस प्रकार मैं मनोहर राम-नाम में रमण करता हूँ। हे वरानने! राम-नाम सहस्रनाम के तुल्य है।
99
रामनाम वरानन ॐ नम इति ।
ब्रह्मोवाच —
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥
नमः अस्तु
नमस्कार हो
अनन्ताय
अनन्त को
सहस्रमूर्तये
सहस्र रूपों वाले को
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे
सहस्र पाद, नेत्र, शिर, जंघा और भुजाओं वाले को
सहस्रनाम्ने
सहस्र नामों वाले को
पुरुषाय शाश्वते
शाश्वत पुरुष को
सहस्रकोटियुगधारिणे
सहस्र कोटि युगों को धारण करने वाले को
नमः
नमस्कार
ब्रह्मा कहते हैं — अनन्त, सहस्र रूपों वाले, सहस्र पाद-नेत्र-शिर-भुजाओं वाले, सहस्र नामों वाले, शाश्वत पुरुष, सहस्र कोटि युगों को धारण करने वाले भगवान को नमस्कार।
100
सहस्रकोटियुगधारिणे नम ॐ नम इति ।
सञ्जय उवाच —
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
यत्र
जहाँ
योगेश्वरः कृष्णः
योगेश्वर श्रीकृष्ण
पार्थः धनुर्धरः
धनुर्धर अर्जुन
तत्र
वहाँ
श्रीः
सम्पत्ति
विजयः
विजय
भूतिः
ऐश्वर्य
ध्रुवा
निश्चित
नीतिः
न्याय
मतिः मम
मेरा विचार है
सञ्जय कहते हैं — जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ सम्पत्ति, विजय, ऐश्वर्य और निश्चित नीति है — यह मेरा विचार है।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 10 / 11