📿 विष्णु सहस्रनाम

श्लोक 31–40

विष्णु सहस्रनाम · 4 / 11
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
31
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥
अमृतांशूद्भवः
अमृत-किरणों (चन्द्रमा) को उत्पन्न करने वाले
भानुः
प्रकाशमान — सूर्य-स्वरूप
शशबिन्दुः
शशक (खरगोश) का चिह्न धारण करने वाले — चन्द्रमा-स्वरूप
सुरेश्वरः
देवताओं के ईश्वर
औषधम्
संसार-रोग की औषधि
जगतः सेतुः
संसार-सागर पार करने का सेतु
सत्यधर्मपराक्रमः
सत्य और धर्म ही जिनका पराक्रम है
भगवान चन्द्रमा के उत्पत्तिकर्ता, सूर्य-स्वरूप और देवेश्वर हैं। वे संसार-रोग की औषधि, भवसागर पार करने का सेतु और सत्य-धर्म-पराक्रमी हैं।
32
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो नलः ।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ॥
भूतभव्यभवन्नाथः
भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों के स्वामी
पवनः
पवित्र करने वाले — वायु-स्वरूप
पावनः
शुद्ध करने वाले
अनलः
अग्नि-स्वरूप — अनन्त तेज
कामदेवः
सब कामनाओं के देवता
कामपालः
भक्तों की कामनाओं का पालन करने वाले
कामी
भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले
कान्तः
परम सुन्दर
कृतागमः
शास्त्रों (आगम) के रचयिता
भगवान तीनों कालों के स्वामी, पवित्रकारक और अग्नि-स्वरूप हैं। वे सब कामनाओं के देवता, भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले, परम सुन्दर और शास्त्रों के रचयिता हैं।
33
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ॥
अनिर्देश्यवपुः
जिनके स्वरूप का वर्णन असम्भव
विष्णुः
सर्वव्यापी
वीरः
पराक्रमी — शूरवीर
अनन्तः
अनन्त — सीमारहित
धनञ्जयः
धन जीतने वाले — अर्जुन को विजय देने वाले
ब्रह्मण्यः
ब्राह्मणों और वेदों के रक्षक
ब्रह्मकृत्
ब्रह्मा (वेद) के रचयिता
ब्रह्मा
सृष्टिकर्ता
ब्रह्म
परम ब्रह्म — सर्वोच्च सत्ता
ब्रह्मविवर्धनः
ब्रह्म (वेद/तप) की वृद्धि करने वाले
भगवान अवर्णनीय स्वरूप वाले, सर्वव्यापी, अनन्त और पराक्रमी हैं। वे वेदों के रक्षक, सृष्टिकर्ता, स्वयं परम ब्रह्म और वैदिक ज्ञान की वृद्धि करने वाले हैं।
34
ब्रह्मवित् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ॥
ब्रह्मवित्
ब्रह्म को जानने वाले
ब्राह्मणः
ब्रह्म-स्वरूप — वेदवेत्ता
ब्रह्मी
ब्रह्म में स्थित
ब्रह्मज्ञः
ब्रह्मज्ञान के स्वामी
ब्राह्मणप्रियः
ब्राह्मणों (ज्ञानियों) को प्रिय
महाक्रमः
महान पग रखने वाले — विश्वव्यापी
महाकर्मा
महान कर्म करने वाले
महातेजाः
महान तेज वाले
महोरगः
शेषनाग (महान सर्प) स्वरूप
भगवान ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्म-स्वरूप और ज्ञानियों को प्रिय हैं। वे महान पराक्रम, महान कर्म, महान तेज वाले और शेषनाग-स्वरूप हैं।
35
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ॥
महाक्रतुः
महान यज्ञ-स्वरूप
महायज्वा
महान यज्ञ करने वाले
महायज्ञः
स्वयं महायज्ञ
महाहविः
महान आहुति
स्तव्यः
स्तुति के योग्य
स्तवप्रियः
स्तुति में प्रसन्न होने वाले
स्तोत्रम्
स्तोत्र-स्वरूप
स्तुतिः
स्तुति-स्वरूप
स्तोता
स्तुति करने वाले
रणप्रियः
धर्म-युद्ध में प्रसन्न होने वाले
भगवान महायज्ञ-स्वरूप, महान आहुति और स्तुति के योग्य हैं। वे स्तोत्र, स्तुति और स्तोता — तीनों स्वयं हैं। वे धर्म-रक्षा के संग्राम में प्रसन्न होते हैं।
36
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ॥
पूर्णः
सर्वथा पूर्ण
पूरयिता
सबकी कामनाएँ पूरी करने वाले
पुण्यः
परम पुण्यमय
पुण्यकीर्तिः
पुण्य कीर्ति वाले
अनामयः
रोगरहित — निर्विकार
मनोजवः
मन की गति वाले — अत्यन्त शीघ्र
तीर्थकरः
तीर्थों के निर्माता — उद्धार के मार्ग बनाने वाले
वसुरेताः
सुवर्ण-बीज वाले — धन के मूल
वसुप्रदः
धन प्रदान करने वाले
भगवान पूर्ण हैं, सबकी कामनाएँ पूरी करते हैं, परम पुण्यमय और निर्विकार हैं। वे मन से भी तेज़ गति वाले, तीर्थों के निर्माता और धनदाता हैं।
37
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ॥
वसुप्रदः
उत्तम धन देने वाले
वासुदेवः
वसुदेव के पुत्र — सब में बसने वाले देव
वसुः
धन-स्वरूप — सबमें निवास करने वाले
वसुमनाः
उदार चित्त वाले
हविः
यज्ञ की आहुति स्वरूप
सद्गतिः
सज्जनों की उत्तम गति
सत्कृतिः
सत्कर्म-स्वरूप
सत्ता
शुद्ध सत्ता — अस्तित्व
सद्भूतिः
सत्-रूप ऐश्वर्य
सत्परायणः
सज्जनों की परम शरण
भगवान वासुदेव — वसुदेव-पुत्र और सबमें बसने वाले देव — हैं। वे यज्ञ-आहुति-स्वरूप, सज्जनों की उत्तम गति, शुद्ध सत्ता और सज्जनों की परम शरण हैं।
38
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ॥
शूरसेनः
शूरवीरों की सेना वाले
यदुश्रेष्ठः
यदुवंश में श्रेष्ठ
सन्निवासः
सबके निवास-स्थान
सुयामुनः
यमुना-तट-वासी — मथुरा से जुड़े
भूतावासः
सब प्राणियों के निवास
वासुदेवः
सबमें बसने वाले देव
सर्वासुनिलयः
सब प्राणों का आश्रय
अनलः
अग्नि-स्वरूप — अनन्त ऊर्जा
भगवान शूरवीरों की सेना वाले, यदुवंश में श्रेष्ठ, सबके निवास-स्थान हैं। वे सब प्राणियों में बसते हैं, सब प्राणों का आश्रय और अग्नि-स्वरूप हैं।
39
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ॥
दर्पहा
अहंकार का नाश करने वाले
दर्पदः
भक्तों को उचित गौरव देने वाले
दृप्तः
आनन्दमग्न — प्रसन्न
दुर्धरः
जिन्हें धारण करना कठिन
अपराजितः
कभी पराजित न होने वाले
विश्वमूर्तिः
विश्वरूप — सम्पूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है
महामूर्तिः
महान स्वरूप वाले
दीप्तमूर्तिः
तेजस्वी स्वरूप
अमूर्तिमान्
निराकार — मूर्तिरहित भी
भगवान अहंकार का नाश करते हैं, भक्तों को गौरव देते हैं और स्वयं सदा आनन्दमग्न हैं। वे अपराजित, विश्वरूप, तेजस्वी और साकार-निराकार दोनों हैं।
40
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।
एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् ॥
अनेकमूर्तिः
अनेक रूप धारण करने वाले
अव्यक्तः
प्रकट न होने वाले — अदृश्य
शतमूर्तिः
सैकड़ों रूपों वाले
शताननः
सैकड़ों मुखों वाले
एकः
एक — अद्वितीय
नैकः
अनेक — बहुरूप
सवः
सोम-यज्ञ स्वरूप
कः
सुख-स्वरूप — ब्रह्मा
किम्
क्या — जिज्ञासा का विषय
यत्
जो — परम तत्त्व
तत्
वह — परम ब्रह्म
पदम् अनुत्तमम्
सर्वोत्तम पद — परम स्थान
भगवान अनेक रूपों में प्रकट होते हैं पर अव्यक्त भी हैं। वे एक होते हुए अनेक हैं। वे सोमयज्ञ, सुख, जिज्ञासा, परम तत्त्व और सर्वोत्तम पद — सब कुछ हैं।

इस भाग में भगवान के ब्रह्म, वासुदेव, यदुश्रेष्ठ, विश्वमूर्ति आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनकी सर्वव्यापकता, यज्ञ-स्वरूपता और अनेक रूपों में प्रकट होने की क्षमता को दर्शाते हैं।

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