📿 हनुमान चालीसा

चौपाई 33–40 एवं दोहा

हनुमान चालीसा · 5 / 5
📖 तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा रचित
चौपाई 33
तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम-जनम के दुख बिसरावै ॥
तुम्हरे भजन
आपका भजन करने से
राम को पावै
श्री राम को पाता है
जनम-जनम के
जन्म-जन्मांतर के
दुख बिसरावै
दुख भूल जाता है
आपका भजन करने से श्री राम की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्मांतर के दुख दूर हो जाते हैं।
चौपाई 34
अंत काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥
अंत काल
अंत समय में
रघुबर पुर
श्री राम के धाम को
जाई
जाता है
जहाँ जन्म
और जहाँ भी जन्म ले
हरि-भक्त कहाई
हरि का भक्त कहलाता है
अंत समय में वह श्री राम के धाम को जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि का भक्त कहलाता है।
चौपाई 35
और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥
और देवता
अन्य देवताओं को
चित्त न धरई
चित्त में न भी धारे
हनुमत सेइ
हनुमान जी की सेवा करने से
सर्ब सुख करई
सब सुख मिलते हैं
अन्य किसी देवता को चित्त में न भी धारे, केवल हनुमान जी की सेवा करने से ही सब सुख प्राप्त होते हैं।
चौपाई 36
संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
संकट कटै
संकट कटते हैं
मिटै सब पीरा
सब पीड़ा मिटती है
जो सुमिरै
जो स्मरण करे
हनुमत बलबीरा
बलवीर हनुमान को
जो बलवीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके सब संकट कटते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है।
चौपाई 37
जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥
जय जय जय
तीन बार जय हो
हनुमान गोसाईं
हनुमान स्वामी की
कृपा करहु
कृपा कीजिए
गुरुदेव की नाईं
गुरुदेव के समान
हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! गुरुदेव के समान हम पर कृपा कीजिए।
चौपाई 38
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥
जो सत बार
जो सौ बार
पाठ कर
पाठ करे
कोई
कोई भी
छूटहि बंदि
बंधनों से छूट जाए
महा सुख होई
महान सुख हो
तुलसीदास जी कहते हैं कि जो इसका सौ बार पाठ करे, वह बंधनों से मुक्त हो और महान सुख प्राप्त करे।
चौपाई 39
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
जो यह पढ़ै
जो इसे पढ़े
हनुमान चालीसा
हनुमान चालीसा को
होय सिद्धि
सिद्धि मिले
साखी
साक्षी हैं
गौरीसा
शिव जी (गौरी के पति)
जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है — इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं।
चौपाई 40
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥
तुलसीदास
तुलसीदास (कवि)
सदा
सदा
हरि चेरा
हरि (श्री राम) का सेवक
कीजै
कीजिए
नाथ
हे नाथ (हनुमान)
हृदय महँ
हृदय में
डेरा
निवास
तुलसीदास सदा हरि के सेवक हैं। हे नाथ हनुमान, मेरे हृदय में सदा निवास कीजिए।
दोहा (समापन)
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥
पवनतनय
पवनपुत्र हनुमान
संकट हरन
संकट दूर करने वाले
मंगल मूरति रूप
मंगलमय स्वरूप
राम लखन सीता सहित
श्री राम, लक्ष्मण और सीता के साथ
हृदय बसहु
हृदय में बसिए
सुर भूप
हे देवताओं के राजा
हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगलमय स्वरूप! श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी के साथ हमारे हृदय में सदा निवास कीजिए, हे देवराज!

चौपाई 33–40 में हनुमान-भक्ति का फल, चालीसा पाठ की महिमा और तुलसीदास जी की विनम्र प्रार्थना है। समापन दोहे में पवनपुत्र से श्री राम, लक्ष्मण और सीता सहित हृदय में बसने की विनती की गई है।

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