शिव पुराण के अनुसार घुश्मा नामक एक स्त्री भगवान शिव की परम भक्त थी। वह हर दिन एक सौ एक मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूजा करती थी और फिर उन्हें पास के तालाब में विसर्जित कर देती थी।
एक दिन परिवार के भीतर एक दुख हुआ। घुश्मा ने शिव से प्रार्थना की और अपनी श्रद्धा से सब कुछ शिव को समर्पित कर दिया। शिव पुराण में बताया गया है कि शिव उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए।
भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए और घुश्मा के परिवार के दुख का निवारण किया। उन्होंने इसी स्थान पर सदैव विराजित रहने का वचन दिया।
घुश्मा की भक्ति के नाम पर ही यह स्थान घृष्णेश्वर कहलाया। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम और बारहवाँ माना जाता रहा है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र इसी के साथ समाप्त होता है।
घुश्मा नामक भक्त की भक्ति के नाम पर ही यह स्थान घृष्णेश्वर कहलाया।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम है — यह द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का अंतिम नाम है। मंदिर वेरुल गाँव में स्थित है, जो एलोरा गुफाओं के पास है। एलोरा गुफाएँ अपनी प्राचीन शैल कला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
मंदिर का स्थापत्य लाल पत्थर से बना दक्षिण भारतीय शैली में है। मंदिर परिसर शांत और छोटा है। यहाँ श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर विशेष परंपरा रही है।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। भक्त यहाँ रोज़ दर्शन के लिए आते आए हैं।
- मंदिर परिसर में घुश्मा के तालाब का भी स्थान है, जो परंपरा में महत्वपूर्ण रहा है।
- एलोरा गुफाओं की यात्रा करने वाले लोग भी यहाँ दर्शन के लिए आते रहे हैं।
- महाशिवरात्रि और श्रावण मास में मंदिर में विशेष भीड़ रहती है।