श्रावण मास की पूर्णिमा — आकाश में उजला चाँद, घर के आँगन में दीपक, और हाथों में रेशम के धागे। यह दिन है रक्षा बंधन का। पुराण परंपरा में श्रावण पूर्णिमा का बड़ा महत्व बताया गया है — यह महीना प्रकृति के नवीनीकरण का समय है, जल और जीवन के मेल का समय।
भविष्य पुराण के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। वृत्रासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। वह इतना बलवान था कि देवराज इंद्र भी उसके सामने कमज़ोर पड़ने लगे। इंद्र की शक्ति क्षीण होने लगी।
भविष्य पुराण की कथा आगे बताती है — इंद्राणी शची ने अपने पति इंद्र की विजय के लिए देवताओं से प्रार्थना की। फिर उन्होंने एक पवित्र सूत्र तैयार किया। श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर वह रक्षासूत्र बाँधा। यह धागा था — लेकिन उसमें स्नेह और संकल्प दोनों बँधे थे।
इंद्र उस रक्षासूत्र को कलाई पर बाँधे युद्धभूमि में गए। भविष्य पुराण के अनुसार, इंद्र ने वृत्रासुर को पराजित किया। उस धागे की शक्ति धागे में नहीं थी — वह शक्ति इंद्राणी के भाव में थी, उनके संकल्प में थी।
यह कथा पुराणों में रक्षासूत्र के सबसे पुराने उल्लेखों में से एक मानी जाती रही है। समय के साथ यह परंपरा परिवारों में फैली। भाई-बहन के बीच इस बंधन ने एक विशेष रूप लिया। परंपरा में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती आई हैं, और भाई उनकी देखभाल का भाव लेकर उपहार देते आए हैं। यह एक दूसरे के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का बंधन है।
रक्षा बंधन के दिन घरों में सुबह से ही तैयारी शुरू हो जाती है। थाली में रोली, चावल, दीपक और रंग-बिरंगी राखियाँ सजती हैं। बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है। कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती है। मिठाई खिलाती है। भाई उपहार देता है। परिवार साथ बैठता है।
इसी दिन कुछ परंपराओं में श्रावणी उपाकर्म भी होता है — वेदपाठ और अध्ययन की परंपरा से जुड़ा एक अनुष्ठान, जो पुराणों में श्रावण मास को ज्ञान और शुभारंभ का काल बताता है।
महाराष्ट्र और गोवा के तटीय गाँवों में इसी दिन नारली पूर्णिमा मनाई जाती है। मछुआरा समाज समुद्र को नारियल अर्पित करते हैं — वर्षा ऋतु के जाने और मछली पकड़ने के मौसम के आगमन का स्वागत। यह भी एक तरह का बंधन है — मनुष्य और प्रकृति के बीच।
एक छोटा-सा धागा। पर उसमें बँधा होता है पूरा विश्वास, पुराना स्नेह, और एक दूसरे के साथ होने का भाव। शायद इसीलिए यह त्योहार इतने वर्षों से, इतने घरों में, इतनी सुबहों में मनाया जाता रहा है।
एक छोटा-सा धागा — पर उसमें पूरा विश्वास बँधा होता है।
रक्षा बंधन केवल भाई-बहन का त्योहार नहीं रहा। पुराण परंपरा में ऋषि अपने शिष्यों को, गुरु अपने विद्यार्थियों को, और समाज के सदस्य एक-दूसरे को रक्षासूत्र बाँधते आए हैं। यह बंधन रक्त-संबंध से बड़ा है — यह देखभाल और साथ का संकल्प है। जहाँ भी स्नेह है, वहाँ यह धागा अपना घर बना लेता है।
इस पर्व में 'रक्षा' का अर्थ एकतरफा नहीं है। रक्षासूत्र बाँधने वाला भी उतना ही इस बंधन में बँध जाता है जितना जिसकी कलाई पर बाँधा जाता है। यह पारस्परिक स्नेह का प्रतीक है — एक-दूसरे के साथ रहने का, एक-दूसरे की परवाह करने का।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह दिन अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। रूप बदलते हैं, पर भाव एक रहता है — यह दिन परिवारों के एक साथ आने का दिन है। मिठाई की खुशबू, धागे का स्पर्श, और प्रिय लोगों के साथ बिताए ये कुछ पल — यही इस त्योहार की असली विरासत है।
- बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधना।
- माथे पर रोली-चावल का तिलक लगाना।
- मिठाई खिलाना और मिठाई खाना।
- भाई द्वारा बहन को उपहार देना।
- परिवार के साथ भोज और मेलमिलाप।
- बड़ों का आशीर्वाद लेना।
- कुछ परंपराओं में दीपक जलाकर थाली सजाना।