पर्व और त्यौहार

मकर संक्रांति

सूर्य के उत्तरायण का पवित्र पर्व — फसल, दान और नई शुरुआत का उत्सव
📍 पूरे भारत में
तिथि
14 जनवरी
हिन्दू मास
पौष शुक्ल / माघ आरंभ
मुख्य देवता
सूर्य देव
📖 महाभारत, भविष्य पुराण और विष्णु पुराण

परंपरा में 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाती है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ते हैं। यह दिन एक नई ऋतु का आरंभ माना जाता रहा है।

महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह की कथा आती है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद भीष्म शर-शय्या पर लेटे थे। उनके शरीर में अनगिनत बाण थे। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था — जब चाहें, देह त्याग सकते थे। किंतु उन्होंने प्रतीक्षा की। वे उत्तरायण की बाट जोहते रहे। महाभारत के अनुसार जब सूर्य उत्तरायण में आए, तब भीष्म पितामह ने देह का त्याग किया।

विष्णु पुराण में उत्तरायण को देवताओं के दिन का काल माना गया है। दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस दृष्टि से मकर संक्रांति वह सन्धि है जब अँधेरे की रात समाप्त होती है और उजाले का दिन शुरू होता है।

भविष्य पुराण में इस दिन स्नान और दान का विशेष उल्लेख है। पुराण के अनुसार इस दिन तिल, गुड़, कंबल और वस्त्र दान करने की परंपरा रही है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी के तट पर स्नान की चर्चा भी पुराण-साहित्य में मिलती है।

यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि का उत्सव भी है। इस समय तक रबी की फसल घर आने लगती है। नए अनाज, तिल और गुड़ से घर भर जाते हैं। इसीलिए पूरे भारत में, अलग-अलग नामों से, यह पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है।

उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति कहते हैं। खिचड़ी बनती है, तिल-गुड़ बाँटे जाते हैं। पंजाब और हरियाणा में इससे एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है — एक पारंपरिक अलाव का पर्व। सामूहिक गीत गाए जाते हैं, मूँगफली और रेवड़ी बाँटी जाती है। 'सुंदर मुंदरिए' जैसे एक पारंपरिक पंजाबी लोक गीत इस अवसर पर गाए जाते रहे हैं।

महाराष्ट्र में इस दिन तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं और कहा जाता है — 'तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला।' यानी मीठा लो और मीठा बोलो। गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण के दिन पतंगें उड़ाई जाती हैं — आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। तमिलनाडु में चार दिन का पोंगल पर्व मनाया जाता है, जिसमें एक दिन गायों और बैलों के सम्मान का है।

असम में माघ बिहू के नाम से यह पर्व मनाया जाता है — सामूहिक भोज और अलाव इसकी पहचान हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में पौष संक्रांति पर गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व माना जाता रहा है। इस प्रकार एक ही खगोलीय घटना पूरे भारत में अलग-अलग रंगों में जीवन और उत्सव बनकर प्रकट होती है।

'तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला' — महाराष्ट्र की परंपरा का यह वाक्य कहता है: तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो। मकर संक्रांति का सार इसी में है।

सूर्य इस सृष्टि के प्रकाश और ऊष्मा के स्रोत हैं। महाभारत और पुराण-साहित्य में सूर्य को जीवन का आधार कहा गया है। मकर संक्रांति उस क्षण का उत्सव है जब सूर्य पुनः उत्तर की ओर अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। परंपरा में यह प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता रहा है।

यह पर्व केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक है। भविष्य पुराण में जो दान की बात कही गई है, वह यही सिखाती है — नई फसल को अकेले नहीं, मिल-बाँटकर खाओ। तिल-गुड़ का आदान-प्रदान, कंबल और वस्त्रों का दान — ये सब इस विचार की अभिव्यक्ति हैं कि समृद्धि तभी सार्थक है जब वह साझा हो।

भीष्म पितामह की प्रतीक्षा — शर-शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण का इंतज़ार — यह केवल एक कथा नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि शुभ समय में जीवन और मृत्यु दोनों सहज हो जाते हैं। पीढ़ियों से भारत के घरों में यह पर्व इसी भावना के साथ मनाया जाता रहा है।

उत्तर भारत
मकर संक्रांति — खिचड़ी, तिल-गुड़, गंगा स्नान
पंजाब, हरियाणा
लोहड़ी — सामूहिक अलाव, मूँगफली-रेवड़ी
गुजरात, राजस्थान
उत्तरायण — पतंगबाज़ी का पर्व
महाराष्ट्र
तिळगूळ — मीठी बातों का पर्व
तमिलनाडु
पोंगल — चार दिन का नवान्न पर्व
कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना
संक्रांति / पेद्दा पंडुगा — घर-घर उत्सव
असम
माघ बिहू — सामूहिक भोज और अलाव
पश्चिम बंगाल, ओडिशा
पौष संक्रांति — गंगासागर मेला
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उत्तरायण का अर्थ
परंपरा में माना जाता रहा है कि इस दिन से सूर्य उत्तर की ओर बढ़ना आरंभ करते हैं। विष्णु पुराण में उत्तरायण को देवताओं के दिन का काल कहा गया है। इसे शुभ काल का आरंभ माना गया है।
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भीष्म पितामह का प्रसंग
महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व के अनुसार, भीष्म पितामह ने शर-शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण की प्रतीक्षा की। उन्होंने उत्तरायण आने पर ही इच्छामृत्यु का वरण किया। यह प्रसंग मकर संक्रांति की गहरी अर्थवत्ता का एक बड़ा आधार माना जाता रहा है।
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फसल का पर्व
यह पर्व नई फसल के घर आने का भी उत्सव है। इसी कारण पूरे देश में अन्न, तिल और गुड़ के व्यंजन बनते आए हैं। भोजन और दान — दोनों इस पर्व के स्वाभाविक अंग रहे हैं।
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दान का महत्व
भविष्य पुराण में इस दिन तिल, गुड़, कंबल और वस्त्रों के दान का उल्लेख है। परंपरा में यह दिन सेवा और साझा करने का माना जाता रहा है। दान केवल देने की क्रिया नहीं — यह नए मौसम में कृतज्ञता व्यक्त करने का तरीका भी रहा है।