शिव पुराण के अनुसार, बहुत पुराने समय की बात है। देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। वे अमृत की खोज में मंदराचल पर्वत को मथानी बनाकर समुद्र मथ रहे थे।
मंथन के क्रम में समुद्र से अनेक रत्न और दिव्य वस्तुएँ निकलीं। किंतु एक समय ऐसा आया जब समुद्र से भयंकर हलाहल विष निकला। उसकी जलन इतनी तीव्र थी कि तीनों लोक व्याकुल हो उठे।
शिव पुराण कहता है — देवता भगवान शिव के पास आए और उनसे विनती की। भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। माता पार्वती ने उनका कंठ पकड़ लिया ताकि वह विष नीचे न उतरे।
वह विष न उगला गया, न निगला गया। वह कंठ में ही ठहर गया। उसी दिन से शिव का एक नाम पड़ा — नीलकंठ। जिनका कंठ नीला है।
शिव पुराण में यह भी बताया गया है कि जिस रात शिव ने यह विष धारण किया, उस पूरी रात देवताओं ने जागकर शिव की स्तुति की। वह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात थी।
शिव पुराण के अनुसार, इसी रात भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ। पार्वती ने वर्षों की तपस्या के बाद शिव को प्राप्त किया था। इस विवाह की स्मृति में भक्त आज भी इस रात जागकर उत्सव मनाते हैं।
लिंग पुराण में वर्णित एक और परंपरा है — इसी रात भगवान शिव अग्निमय ज्योतिर्स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। भारत में बारह स्थानों पर उस ज्योति की पूजा ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। इनका विस्तृत वर्णन इस वेबसाइट के ज्योतिर्लिंग खंड में उपलब्ध है।
शिव पुराण में चार प्रहर पूजा का विधान बताया गया है। रात को चार भागों में बाँटकर भक्त प्रत्येक प्रहर में जल, दूध, दही और घी से अभिषेक करते हैं। रात का प्रत्येक प्रहर एक नई पूजा लेकर आता है।
स्कंद पुराण में बिल्वपत्र को शिव को अर्पित किए जाने का उल्लेख आता है। तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र इस रात विशेष रूप से अर्पण किया जाता है। शिव पुराण में 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का उल्लेख इस पर्व की रात जप के संदर्भ में आता है।
महाशिवरात्रि एक ऐसी रात है जो भीतर की ओर मुड़ने की है। बाहर अंधेरा हो तो होने दो — भीतर जागरण, भीतर स्मरण, भीतर शिव। यही इस रात का भाव है।
जो विष को धारण कर सके, बिना विचलित हुए — वही नीलकंठ है।
शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि का पर्व उस रात की स्मृति में मनाया जाता है जब शिव ने हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया और तीनों लोकों की रक्षा की। यह पर्व एक गहरे प्रतीक को जीवित रखता है — कठिनाई को थामे रहना, उससे टूटे बिना।
यह रात्रि-जागरण का पर्व है। भक्त पूरी रात जागकर, ध्यान में बैठकर और मंत्र जपकर इस पर्व को मनाते हैं। शिव से जुड़े बारह ज्योतिर्लिंग स्थलों पर इस रात विशेष दर्शन की परंपरा रही है — उन स्थलों का परिचय इस वेबसाइट के ज्योतिर्लिंग खंड में मिलेगा।
शिव-पार्वती के दिव्य विवाह की परंपरा भी इसी रात से जुड़ी है। भक्त इसे दो भावों का संगम मानते हैं — नीलकंठ की करुणा और शिव-शक्ति का मिलन। दोनों एक ही रात की दो छवियाँ हैं।
- शिव पुराण के अनुसार इस रात रात्रि जागरण की परंपरा है — भक्त पूरी रात जागते हैं।
- चार प्रहर में पूजा होती है — शिव पुराण में इसका वर्णन है। हर प्रहर में अभिषेक किया जाता है।
- जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक की परंपरा रही है।
- स्कंद पुराण में वर्णित बिल्वपत्र इस रात शिव को अर्पित किए जाते हैं।
- शिव पुराण में उल्लिखित 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप इस रात विशेष रूप से किया जाता है।
- शिवलिंग को सफेद पुष्प और धतूरे के फूल अर्पित करने की परंपरा है।
- कुछ परंपराओं में भक्त उपवास रखते हैं और फलाहार करते हैं।
- ज्योतिर्लिंग मंदिरों में इस रात विशेष दर्शन की व्यवस्था रहती है।