पर्व और त्यौहार

कृष्ण जन्माष्टमी

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव — भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि
📍 पूरे भारत में
तिथि
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (मध्यरात्रि)
हिन्दू मास
भाद्रपद
मुख्य देवता
भगवान श्रीकृष्ण
📖 भागवत पुराण दशम स्कंध, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण

भागवत पुराण दशम स्कंध में बताया गया है — बहुत पुराने समय की बात है। मथुरा में राजा कंस का राज था। उसने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था। एक दिव्य वाणी ने उसे बताया था कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसके लिए संकट लाएगा। इसलिए कंस ने देवकी के एक-एक संतान को छीन लिया।

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात थी। रोहिणी नक्षत्र था। घनघोर बादल थे। वर्षा हो रही थी। और उसी मध्यरात्रि में — जब चारों ओर अँधेरा था — देवकी की कोख से एक दिव्य शिशु का जन्म हुआ। यह उनकी आठवीं संतान थी।

भागवत पुराण में वर्णित है — जन्म लेते ही शिशु ने अपना चतुर्भुज विष्णु-स्वरूप प्रकट किया। देवकी और वसुदेव ने उस दिव्य रूप के दर्शन किए। फिर शिशु ने अपना सामान्य शिशु-रूप धारण कर लिया।

उसी क्षण कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। पहरेदार गहरी नींद में चले गए। वसुदेव शिशु को लेकर निकले। विष्णु पुराण में भी यह प्रसंग आता है। बाहर यमुना नदी उफान पर थी। परंतु जैसे ही वसुदेव ने शिशु को अपने सिर के ऊपर उठाया — हरिवंश पुराण में वर्णित है — यमुना ने उन्हें मार्ग दे दिया। शेषनाग ने फन फैलाकर शिशु के ऊपर छत्र बना दिया।

वसुदेव यमुना पार करके गोकुल पहुँचे। वहाँ नंद और यशोदा के घर में थे। यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव ने वह कन्या उठाई और अपने शिशु को यशोदा के पास सुला दिया। वे फिर कारागार लौट आए।

भागवत पुराण में बताया गया है — जब कंस उस कन्या को समाप्त करने आया, तो वह कन्या उसके हाथों से छूट गई। वह आकाश में चली गई और दिव्य रूप में प्रकट हुई। उस दिव्य वाणी ने कंस को बताया कि जो उसके लिए संकट लाएगा, वह गोकुल में सुरक्षित है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। वे मथुरा की उस कारा में नहीं, बल्कि गोकुल में, यशोदा की गोद में पले-बढ़े। इस पूरी कथा का विस्तृत वर्णन कहानियाँ खंड में 'कृष्ण जन्म' पृष्ठ पर उपलब्ध है।

जन्माष्टमी की रात भक्त इसी क्षण का स्मरण करते हैं। मंदिरों और घरों में बाल कृष्ण की झाँकी सजाई जाती है। पालना झुलाया जाता है। मध्यरात्रि को जन्म के समय पर विशेष आरती और अभिषेक होता है।

वर्ष का सबसे अँधेरा पक्ष, और उसी में सबसे दिव्य प्रकाश का आगमन — यही जन्माष्टमी की पौराणिक स्मृति है। महाराष्ट्र में अगले दिन दही हांडी की पारंपरिक प्रथा रही है — बाल कृष्ण की माखन-लीलाओं की स्मृति में।

मध्यरात्रि का अँधेरा था — और उसी क्षण दिव्य प्रकाश का जन्म हुआ।

भागवत पुराण दशम स्कंध में जन्माष्टमी का उल्लेख भगवान विष्णु के पृथ्वी पर अवतरण के रूप में आता है। परंपरा में यह तिथि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मध्यरात्रि में मनाई जाती है — क्योंकि भागवत पुराण में शिशु का जन्म ठीक मध्यरात्रि में बताया गया है।

यह पर्व पूरे भारत में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। मंदिरों में रात्रि जागरण, बाल-कृष्ण की झाँकी और मध्यरात्रि के अभिषेक की परंपरा रही है। बच्चों के लिए यह पर्व विशेष प्रिय है — वे पालना झुलाते हैं, माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं, और कृष्ण के बचपन की कहानियाँ सुनते हैं।

इस पर्व की एक विशेष बात है मध्यरात्रि की प्रतीक्षा। घर के बच्चे-बूढ़े सब जागते हैं। जब घड़ी बारह बजाती है, शंख बजते हैं, घंटियाँ बजती हैं, और 'जय श्रीकृष्ण' की आवाज़ गूँज उठती है। यही क्षण जन्माष्टमी का हृदय है।

तिथि
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी
नक्षत्र
भागवत पुराण में रोहिणी नक्षत्र का उल्लेख है
प्रमुख स्रोत
भागवत पुराण दशम स्कंध, विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण
पारंपरिक व्रत
फलाहार व्रत, मध्यरात्रि के बाद पारण
मुख्य अनुष्ठान
मध्यरात्रि को बाल कृष्ण विग्रह का पंचामृत अभिषेक
छप्पन भोग
परंपरा में कृष्ण को 56 प्रकार के भोग अर्पण की रीति
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मध्यरात्रि जन्म
भागवत पुराण दशम स्कंध के अनुसार शिशु का जन्म ठीक मध्यरात्रि में हुआ था — इसलिए मध्यरात्रि में अभिषेक और जन्मोत्सव की परंपरा रही है।
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झाँकी और पालना
घरों और मंदिरों में बाल कृष्ण की झाँकी सजाई जाती है। नन्हा पालना, मोर पंख, बाँसुरी और गोकुल का दृश्य — ये सब उस रात के वातावरण को जीवंत करते हैं।
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कृष्ण जन्म की पूरी कथा
भागवत पुराण में वर्णित कृष्ण जन्म की विस्तृत कथा कहानियाँ खंड में 'कृष्ण जन्म' पृष्ठ पर उपलब्ध है। देवकी, वसुदेव, यमुना पार, गोकुल आगमन — सब कुछ सरल हिन्दी में।
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दही हांडी
महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी की पारंपरिक प्रथा रही है। यह श्रीकृष्ण की बाल माखन-लीलाओं की स्मृति में एक पारंपरिक आयोजन है।