भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में एक पुरानी कथा आती है। बहुत समय पहले की बात है — हिरण्यकशिपु नाम का एक राजा था। वह बहुत शक्तिशाली था। उसे अहंकार था कि संसार में उसके बराबर कोई नहीं।
भागवत पुराण के अनुसार हिरण्यकशिपु का एक छोटा बेटा था — प्रह्लाद। प्रह्लाद बहुत भोला और शांत था। उसका मन भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। वह बचपन से ही विष्णु का नाम लेता था।
हिरण्यकशिपु यह देखकर दुखी हो जाता था। उसने प्रह्लाद को कई बार समझाया। लेकिन प्रह्लाद की भक्ति कम नहीं हुई। भागवत पुराण बताता है — सच्ची भक्ति मन में गहरी जड़ें पकड़ लेती है, कोई उसे उखाड़ नहीं सकता।
हिरण्यकशिपु की एक बहन थी — होलिका। भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में वर्णित है कि होलिका को एक वरदान प्राप्त था। उस वरदान के कारण वह अग्नि में नहीं जल सकती थी। हिरण्यकशिपु ने सोचा — होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे।
पौराणिक कथा के अनुसार होलिका अग्नि में जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। भक्ति की रक्षा हुई। भगवान विष्णु ने अपने भक्त को संभाल लिया। यह कथा भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में विस्तार से कही गई है।
भविष्य पुराण के अनुसार इसी घटना की याद में होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात लोग एक स्थान पर इकट्ठे होते हैं। अग्नि जलाई जाती है। नारियल और अन्न उस अग्नि को अर्पण किए जाते हैं। यह परंपरा पुरानी कटुताओं और बुराइयों को छोड़ने का प्रतीक मानी गई है।
अगले दिन रंग और गुलाल का उत्सव होता है। नारद पुराण में फाल्गुन मास के इस रंगोत्सव का उल्लेख आता है। सब मिलकर रंग खेलते हैं। बड़े-छोटे, सब एक हो जाते हैं। पुरानी शिकायतें भुला दी जाती हैं। गुजिया और मालपुआ जैसी मिठाइयाँ घरों में बनती हैं।
ब्रज क्षेत्र में — मथुरा और वृंदावन के आसपास — यह रंगोत्सव कृष्ण-लीला से जुड़ा माना जाता रहा है। वहाँ फूलों की होली की परंपरा है। बरसाना की लठमार होली की परंपरा भी बहुत पुरानी है। पश्चिम बंगाल में इसे दोल यात्रा कहते हैं। महाराष्ट्र और गोवा में शिमगा उत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता रहा है।
यह पर्व शीत ऋतु के जाने और वसंत के आने का उत्सव है। प्रकृति में नए फूल खिलते हैं। पेड़ों पर नई कोंपलें आती हैं। होली इसी नवीनता का स्वागत है — भीतर से भी, बाहर से भी।
भक्ति के आगे बड़े से बड़ा बल भी झुक जाता है।
भागवत पुराण की प्रह्लाद-कथा होली के केंद्र में है। यह कथा बताती है कि अहंकार और बल से बड़ी शक्ति है — सच्ची भक्ति। जब प्रह्लाद बचकर आया, तो यह सिर्फ एक बच्चे का बचना नहीं था। यह भक्ति की जीत थी। होलिका दहन उसी जीत का प्रतीक माना गया है।
रंगोत्सव का एक और गहरा अर्थ है। जब सब एक-दूसरे पर रंग लगाते हैं, तो बड़े-छोटे का भेद मिट जाता है। रंग से रंगे चेहरे सब एक जैसे दिखते हैं। परंपरा में यह माना जाता रहा है कि होली पुराने मन-मुटाव को धो देती है। नारद पुराण में इस रंगोत्सव को वसंत के स्वागत से जोड़ा गया है।
होली सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं है। यह फाल्गुन पूर्णिमा की रात से शुरू होकर अगले दिन की सुबह तक चलता है। एक तरफ अग्नि — पुराने का विसर्जन। दूसरी तरफ रंग — नए का स्वागत। यही होली का भाव है।
- होलिका दहन की रात सामूहिक अग्नि जलाई जाती है और पूजा की जाती है।
- नारियल और अन्न अग्नि को अर्पण करने की परंपरा रही है।
- अगले दिन सुबह रंग और गुलाल के साथ उत्सव होता है।
- घरों में गुजिया और मालपुआ जैसी पारंपरिक मिठाइयाँ बनती हैं।
- परिवार और पड़ोसी मिलकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं।
- पुरानी शिकायतों को भुलाकर नए संबंध का आरंभ माना जाता है।
- सामूहिक गायन और लोक-गीतों की परंपरा भी इस पर्व से जुड़ी रही है।