ब्रह्म वैवर्त पुराण के गणपति खंड में यह कथा आती है। एक बार माता पार्वती ने उबटन से एक बालक का रूप बनाया। उन्होंने उसमें प्राण डाले। वह बालक उनका पुत्र बना।
पार्वती ने उस बालक को द्वारपाल बनाया। उन्होंने कहा — बिना मेरी आज्ञा के किसी को भी अंदर मत आने देना। बालक ने माँ की बात मान ली।
कुछ ही समय बाद भगवान शिव आए। बालक उन्हें पहचानता नहीं था। उसने उन्हें भी रोका। एक अप्रत्याशित घटना घटी — और बालक मूर्छित हो गया।
पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ, तो वे बहुत दुखी हुईं। भगवान शिव ने तुरंत उपाय किया। उन्होंने उत्तर दिशा से एक हाथी का दिव्य सिर लाया। उसे बालक को दिया। भगवान शंकर ने उसे नया दिव्य रूप दिया। तब से वे गणपति — गणों के स्वामी — कहलाए।
गणेश पुराण के अनुसार, देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि इस बालक को सर्वप्रथम पूजनीय बनाएँ। भगवान शिव ने वरदान दिया। तब से गणेश को प्रथम पूजा का अधिकार मिला। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका स्मरण किया जाता रहा है।
गणेश पुराण में यह भी बताया गया है कि गणेश विघ्नहर्ता हैं — रास्ते की बाधाओं को दूर करने वाले। जहाँ भी कोई शुभ कार्य आरंभ होता है, वहाँ पहले गणेश का नाम लिया जाता है।
मुद्गल पुराण में गणेश के बत्तीस रूपों का विस्तृत वर्णन है। प्रत्येक रूप एक विशेष भाव और शक्ति को दर्शाता है। मुद्गल पुराण के अनुसार गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय है। मीठे चावल के आटे से बना यह नैवेद्य इस पर्व का प्रमुख प्रसाद माना जाता रहा है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को घरों में मिट्टी की गणेश मूर्ति की स्थापना की जाती है। यह परंपरा बहुत पुरानी है। परिवार के बड़े-छोटे मिलकर गणपति का स्वागत करते हैं। पूजा होती है, आरती होती है, मोदक का भोग लगाया जाता है।
परंपरा में डेढ़ दिन, तीन दिन, पाँच दिन, सात दिन या दस दिन तक गणेश की घरेलू स्थापना की रीति रही है। इन दिनों में घर का वातावरण एक छोटे मंदिर जैसा हो जाता है। बच्चे-बड़े सब गणपति बाप्पा के आसपास रहते हैं।
अंतिम दिन — अनंत चतुर्दशी — मूर्ति का विसर्जन होता है। परिवार गणपति को अगले वर्ष आने की प्रार्थना के साथ विदा करता है। यह विदाई भावपूर्ण होती है — पर उसमें दुख नहीं, प्रतीक्षा का भाव है। 'गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ'।
'गणपति बाप्पा मोरया' — यह पुकार केवल एक नाम नहीं, एक परिवार के आत्मीय स्वागत का भाव है।
गणेश पुराण के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य देव हैं। किसी भी मंगल कार्य से पहले उनका स्मरण किया जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का यह पर्व वर्षों से घर-घर मनाया जाता रहा है। यह किसी बड़े मंदिर या तीर्थ की यात्रा नहीं माँगता — यह घर में ही देवता का स्वागत है।
मिट्टी की मूर्ति की स्थापना और विसर्जन — दोनों इस परंपरा के महत्वपूर्ण अंग हैं। मूर्ति जल में घुल जाती है, प्रकृति में लौट जाती है। परंपरा में यह विचार रहा है कि आगमन और विदाई दोनों जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। गणेश चतुर्थी यह भाव सरल रूप से सिखाती है।
मुद्गल पुराण में गणेश के बत्तीस रूपों का वर्णन है। यह पुराण गणेश उपासना की विस्तृत परंपरा का साक्षी है। इस पर्व में घरों में बनने वाला हर मोदक, हर दीपक, हर आरती — उसी प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है।
- घर में मिट्टी की गणेश मूर्ति की स्थापना।
- प्रातः और संध्या की आरती।
- मोदक का भोग — मुद्गल पुराण की परंपरा।
- दूर्वा (दूब घास) अर्पण — परंपरा में गणेश को प्रिय।
- पुष्प, हल्दी-कुंकुम और धूप-दीप।
- परिवार का सामूहिक भजन और आरती।
- अनंत चतुर्दशी को मूर्ति का जल में विसर्जन।
- अगले वर्ष के आगमन की प्रार्थना।