ऋग्वेद के सूर्य सूक्त में सूर्य देव की स्तुति बहुत पुरातन काल से होती आई है। ऋषियों ने सूर्य को जीवनदाता माना। उन्होंने कहा कि यह प्रकाश ही संसार को थामे हुए है।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में षष्ठी देवी का वर्णन आता है। उन्हें सूर्य देव की शक्ति रूप माना गया है। इन्हें ही छठी मैया कहा जाता है।
स्कंद पुराण में सूर्य की कार्तिक शुक्ल षष्ठी की उपासना का उल्लेख आता है। उस दिन नदी के घाट पर खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा पुरानी है।
महाभारत में सूर्य के परम भक्त कर्ण का भी उल्लेख मिलता है। परंपरा में सूर्य-उपासना की यह धारा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र में गहराई से बनी रही।
पहले दिन को नहाय खाय कहते हैं। परिवार के सदस्य नदी या तालाब में स्नान करते हैं। उस दिन सात्विक भोजन बनाया जाता है — चना दाल, लौकी और अरवा चावल। घर की सफाई होती है और मन को भी शांत किया जाता है।
दूसरे दिन को खरना कहते हैं। सूर्यास्त के बाद परिवार के व्रती सदस्य गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाते हैं। पहले सूर्य देव को भोग लगाया जाता है, फिर परिवार और पड़ोसी प्रसाद ग्रहण करते हैं।
तीसरे दिन सायं काल संध्या अर्घ्य दिया जाता है। बाँस की बनी दउरा में ठेकुआ, गन्ना, नारियल और ऋतु फल सजाए जाते हैं। परिवार घाट पर जाता है। डूबते सूरज को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है।
चौथे दिन भोर से पहले ही परिवार घाट पर पहुँच जाता है। उगते सूरज की प्रतीक्षा होती है। पहली किरण के साथ उषा अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रत का समापन होता है।
घाट पर लोकगीत गाए जाते हैं। ये भोजपुरी, मैथिली और मागधी में होते हैं। इनमें सूर्य देव और छठी मैया की वंदना होती है। यह पर्व पीढ़ियों से परिवार के बड़े-बूढ़ों ने बच्चों को सिखाया है।
छठ की सबसे सुंदर बात यही है — न कोई मूर्ति, न कोई मंदिर। बस नदी, सूर्य, आकाश और परिवार। इसी सरलता में इसका सबसे गहरा अर्थ छिपा है।
उगते सूरज को तो सब नमन करते हैं — छठ में डूबते सूरज को भी धन्यवाद दिया जाता है।
ऋग्वेद के सूर्य सूक्त से लेकर स्कंद पुराण तक, सूर्य की उपासना भारतीय परंपरा में बहुत गहरी है। छठ पूजा उस परंपरा का जीवंत रूप है। यह पर्व नदी, जल, सूर्य और धरती — इन सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखता है।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित षष्ठी देवी को छठी मैया के रूप में इस पर्व में पूजा जाता है। वे सूर्य देव की शक्ति रूप मानी जाती हैं। परंपरा में यह माना जाता है कि यह उपासना परिवार और संतान के जीवन में सूर्य का आशीर्वाद लाती है।
यह पर्व बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र की भोजपुरी-मैथिली-मागधी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। परिवार के सभी सदस्य — बच्चे, बुजुर्ग, युवा — साथ मिलकर यह पर्व मनाते हैं।
- घाट पर परिवार के सभी सदस्य एकत्र होते हैं — बच्चे भी साथ रहते हैं।
- संध्या अर्घ्य के समय घाट पर दीप जलाए जाते हैं।
- लोकगीत गाए जाते हैं जिनमें सूर्य देव और छठी मैया की वंदना होती है।
- बाँस की दउरा में ठेकुआ, गन्ना, नारियल और फल सजाकर घाट तक ले जाने की परंपरा है।
- अर्घ्य के बाद प्रसाद परिवार और उपस्थित लोगों में बाँटा जाता है।
- खरना का प्रसाद पड़ोसियों और मिलने-जुलने वालों को भी दिया जाता है।
- नदी के घाट की सफाई पर्व से पहले परिवार और समुदाय मिलकर करते हैं।
- परंपरा में परिवार के सदस्य — विशेष रूप से महिलाएँ — यह व्रत करती आई हैं।