पर्व और त्यौहार

छठ पूजा

सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का चार दिवसीय पर्व
📍 बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, नेपाल तराई
तिथि
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी (चार दिन)
हिन्दू मास
कार्तिक
मुख्य देवता
सूर्य देव और छठी मैया
📖 ऋग्वेद सूर्य सूक्त, ब्रह्म वैवर्त पुराण और स्कंद पुराण

ऋग्वेद के सूर्य सूक्त में सूर्य देव की स्तुति बहुत पुरातन काल से होती आई है। ऋषियों ने सूर्य को जीवनदाता माना। उन्होंने कहा कि यह प्रकाश ही संसार को थामे हुए है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में षष्ठी देवी का वर्णन आता है। उन्हें सूर्य देव की शक्ति रूप माना गया है। इन्हें ही छठी मैया कहा जाता है।

स्कंद पुराण में सूर्य की कार्तिक शुक्ल षष्ठी की उपासना का उल्लेख आता है। उस दिन नदी के घाट पर खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा पुरानी है।

महाभारत में सूर्य के परम भक्त कर्ण का भी उल्लेख मिलता है। परंपरा में सूर्य-उपासना की यह धारा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र में गहराई से बनी रही।

पहले दिन को नहाय खाय कहते हैं। परिवार के सदस्य नदी या तालाब में स्नान करते हैं। उस दिन सात्विक भोजन बनाया जाता है — चना दाल, लौकी और अरवा चावल। घर की सफाई होती है और मन को भी शांत किया जाता है।

दूसरे दिन को खरना कहते हैं। सूर्यास्त के बाद परिवार के व्रती सदस्य गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाते हैं। पहले सूर्य देव को भोग लगाया जाता है, फिर परिवार और पड़ोसी प्रसाद ग्रहण करते हैं।

तीसरे दिन सायं काल संध्या अर्घ्य दिया जाता है। बाँस की बनी दउरा में ठेकुआ, गन्ना, नारियल और ऋतु फल सजाए जाते हैं। परिवार घाट पर जाता है। डूबते सूरज को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है।

चौथे दिन भोर से पहले ही परिवार घाट पर पहुँच जाता है। उगते सूरज की प्रतीक्षा होती है। पहली किरण के साथ उषा अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रत का समापन होता है।

घाट पर लोकगीत गाए जाते हैं। ये भोजपुरी, मैथिली और मागधी में होते हैं। इनमें सूर्य देव और छठी मैया की वंदना होती है। यह पर्व पीढ़ियों से परिवार के बड़े-बूढ़ों ने बच्चों को सिखाया है।

छठ की सबसे सुंदर बात यही है — न कोई मूर्ति, न कोई मंदिर। बस नदी, सूर्य, आकाश और परिवार। इसी सरलता में इसका सबसे गहरा अर्थ छिपा है।

उगते सूरज को तो सब नमन करते हैं — छठ में डूबते सूरज को भी धन्यवाद दिया जाता है।

ऋग्वेद के सूर्य सूक्त से लेकर स्कंद पुराण तक, सूर्य की उपासना भारतीय परंपरा में बहुत गहरी है। छठ पूजा उस परंपरा का जीवंत रूप है। यह पर्व नदी, जल, सूर्य और धरती — इन सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित षष्ठी देवी को छठी मैया के रूप में इस पर्व में पूजा जाता है। वे सूर्य देव की शक्ति रूप मानी जाती हैं। परंपरा में यह माना जाता है कि यह उपासना परिवार और संतान के जीवन में सूर्य का आशीर्वाद लाती है।

यह पर्व बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र की भोजपुरी-मैथिली-मागधी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। परिवार के सभी सदस्य — बच्चे, बुजुर्ग, युवा — साथ मिलकर यह पर्व मनाते हैं।

पहला दिन — नहाय खाय
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी। नदी स्नान, सात्विक भोजन, घर की शुद्धि।
दूसरा दिन — खरना
कार्तिक शुक्ल पंचमी। सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद।
तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य
कार्तिक शुक्ल षष्ठी। घाट पर डूबते सूरज को जल और दूध का अर्घ्य।
चौथा दिन — उषा अर्घ्य
कार्तिक शुक्ल सप्तमी। भोर में उगते सूरज को अर्घ्य, व्रत का समापन।
प्रसाद
ठेकुआ (गेहूँ-गुड़ की मिठाई), गन्ना, नारियल, केला और ऋतु फल।
पात्र
बाँस की बनी दउरा में प्रसाद सजाकर घाट पर ले जाया जाता है।
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ठेकुआ
गेहूँ के आटे और गुड़ से बना यह विशेष प्रसाद छठ पूजा की पहचान है। इसे घी में पकाया जाता है।
🎋
बाँस की दउरा
बाँस से बनी टोकरी में प्रसाद सजाकर घाट तक ले जाने की यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
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छठ के लोकगीत
भोजपुरी, मैथिली और मागधी में गाए जाने वाले ये लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाए जाते रहे हैं।
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दो अर्घ्य
संध्या अर्घ्य में डूबते सूरज को और उषा अर्घ्य में उगते सूरज को जल और दूध अर्पित किया जाता है — यह दोनों समय की उपासना इस पर्व की विशेषता है।