गणेश पुराण के अनुसार पाली गाँव में बल्लाल नाम का एक बच्चा रहता था। वह बड़ा भक्त था। वह अपने साथियों को भी गणेश जी की उपासना करना सिखाता था। घर-घर से पत्थर इकट्ठे करके वे गणेश जी की मूर्ति बनाते और पूजा करते।
गणेश पुराण में बताया गया है कि बल्लाल के पिता और गाँव के कुछ लोग इस बात से नाराज़ थे। उन्होंने बल्लाल को बहुत कष्ट दिया। पर बल्लाल ने गणेश जी की उपासना नहीं छोड़ी। वह जंगल में जाकर भी पूजा करता रहा।
गणेश पुराण के अनुसार बल्लाल की पुकार सुनकर गणेश जी वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने बल्लाल को अपनी भक्ति के लिए आशीर्वाद दिया। फिर अपने असली रूप में प्रकट होकर उन्होंने कहा — 'तुम्हारे नाम से मैं यहाँ बल्लाळेश्वर के रूप में विराजूँगा।'
ऐसी मान्यता रही है कि अष्टविनायक के आठ मंदिरों में यही एकमात्र मंदिर है जो किसी भक्त के नाम पर बना है। बाकी सातों मंदिरों में गणेश जी के अपने नाम हैं, पर यहाँ वे भक्त के प्रेम के नाम पर जाने जाते हैं।
गणेश पुराण के अनुसार बल्लाल की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उसके नाम से यहाँ विराजने का वरदान दिया।
पाली का बल्लाळेश्वर मंदिर सह्याद्रि की पहाड़ियों के बीच बसा है। यह स्थान इसलिए विशेष माना जाता रहा है क्योंकि यहाँ गणेश जी किसी दैत्य का अंत करने के बाद नहीं, बल्कि एक बच्चे की श्रद्धा के कारण प्रकट हुए। परंपरा में यह भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है।
मंदिर के पास एक कुंड है जहाँ भक्त स्नान करते हैं। माघ चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के समय यहाँ विशेष उत्सव होता है। भक्त दूर-दूर से यहाँ आते हैं, विशेष रूप से वे जो अपने बच्चों के लिए आशीर्वाद माँगने आते हैं।
- मंदिर वर्ष भर खुला रहता है।
- प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है।
- माघ शुक्ल चतुर्थी और भाद्रपद गणेश चतुर्थी पर विशेष उत्सव होता है।
- मंदिर परिसर में कुंड है — भक्त दर्शन से पहले स्नान करते हैं।